
आरा/भोजपुर ( डॉ जे बी पांडेय)12 सितंबर।आरा या तो कहें शाहाबाद साहित्य साधना का अमृत काल रहा है और आज भी है।सरस्वती के वरद् साधक केदारनाथ मिश्र प्रभात जी बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे।पुलिस सेवा में उच्च पद पर रहते हुए भी इन्होंने साहित्य की अपूर्व सेवा की। यह इनके साहित्य प्रेम का परिचालक है।इनकी कवि प्रतिभा किशोरावस्था मे ही अंगडाई ले उठी थी और 1928 में ही -कलेजे के टुकडे के नाम से एक संग्रह निकल गया।प्रभात जी मूलतः कवि थे किन्तु साहित्य की अन्य विधाओं पर भी इनकी लेखनी साधिकार चली है।प्रभात जी बालको के लिए -सत्यं शिवं सुन्दर, किशोरों के लिए-समुद्र के मोती, आश्चर्यजनक कहानियां ,मनोरंजक कहानियां,मूर्खों की कहानियां, परिणत वय के लिए कंपन एवम् चिर स्पर्श, उक्त कथन के प्रमाण हैं।गीतकार के रूप में कैकेयी,ऋतंवरा,प्रभास कृष्ण, तप्त गृह, कर्ण,व्रत बद्ध,अस्थि दान,मुक्ति संग्राम, राष्ट्र-पुरुष, श्वेत नील,कलापिनी,कंपन,सेतुबंध,शुभ्रा, और प्रवीर जैसे प्रबंध काव्यों की रचना कर उन्होंने इस क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।
1973 में जैन कालेज आरा के गुरुदेव डा दीनानाथ सिंह महाकवि केदारनाथ मिश्र प्रभात के छत्रपति शिवाजी के जीवन पर आधारित खंड काव्य ‘राष्ट्र पुरुष’ को पढ़ाते हुए कहा करते थे कि बिहार के कवियों को एक चतुर्भुज मान लिया जाये तो उसकी एक भुजा राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर होंगे तो दूसरी भुजा केदारनाथ मिश्र प्रभात,तीसरी भुजा मोहनलाल महतो वियोगी और चौथी भुजा आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी होंगे,उनका यह कथन आज तक मुझे भली-भांति याद है।इन चारों कवियों पर साहित्य जगत् को नाज और ताज है। 11 सितम्बर 1907 को वीर भूमि आरा में जन्मे ऐसे राष्ट्र के गौरव गायक महाकवि प्रभात जी का 2 अप्रैल 1984 को पटना में आकस्मिक निधन हो गया। उनके आकस्मिक निधन से साहित्यिक जगत् की अपूरणीय क्षति हुई।
तुम जीवित थे तो सुनने का जी करता था,
तुम चले गये तो गुनने का जी करता है।
तुम सिमटे थे तो सहमी सहमी सांसें थीं,
तुम बिखर गये तो चुनने का जी करता है।
