
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)30 अगस्त।श्री दिगंबर जैन चंद्रप्रभु मंदिर में चातुर्मास कर रहे मुनि श्री विशल्यसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए बोले कि ‘अहं करोति इति अहंकारः । ‘मैं करता हूँ ‘ यह जो भाव है यही अहंकार का भाव है। या कि ‘मैं कुछ हूँ’ इस तरह का भाव अहंकार है। ‘मैं हूँ’ ये तो अपनी ॲग्जिस्टेंस (अस्तित्त्व) का भाव है, ये तो हर एक को अनुभव होती है लेकिन ‘ मैं कुछ हूँ ‘आई एम सम थिंग’ – ये जो भाव हमें घेर लेता है इसी को कहते हैं – ‘अंहकार ‘ क्या होता है अंहकार के आने से ? और क्या होता है हमारे अंदर मृदुता और कोमलता आने से ? इन दोनों चीजों को (स्थितियों को) हम जरा सा समझ लें। जब हम किसी दूसरे से सम्मान की अंकाक्षा रखते हैं, अपनी योग्यता नही होने पर भी, तब एक छटपटाहट हमारे भीतर होती है। सम्मान नहीं मिलने पर भी और सम्मान मिलने पर भी दोनों ही स्थितियों में छटपटाहट होती है। नहीं मिलने पर तो होती ही है पर अगर मिल जाता है तो मिलने पर भी ऐसा लगता है जैसे कम मिला। कभी भी तृप्ति नहीं होती।लिखा तो यह है कि ‘मानेन तृप्तिमति भोगेन न ‘ – व्यक्ति को भोगों से उतनी तृप्ति नहीं मिलती जितनी मान-सम्मान से मिलती है। लेकिन आचार्य भगवंत इससे भी आगे कहते हैं कि तृप्ति मान-सम्मान से नहीं मिलती बल्कि मान-सम्मान मिलेन के साथ हमारे भीतर जो कृतज्ञता और विनय आती है उससे तृप्ति मिलती है।इसलिए जहाँ लिखा है ‘ मानेन तृप्तिमति भोगेन न ‘ वहाँ उसका अर्थ है कि जब हम दूसरे से सम्मान पाते हैं तो हमारे भीतर क्या आना चाहिए? हमारे भीतर और अधिक विनय आनी चाहिए और अधिक नम्रता आनी चाहिए, झुकने का मन हो जाना चाहिए, तब तो वह सम्मान भी बुरा नहीं है। मैं अपनी योग्यता बढ़ाऊँ और अपनी योग्यता से विशिष्टता प्राप्त करुँ – यह बुरी बात नहीं है लेकिन मैं अपने को चार लोगों के बीच में विशिष्ट मानूँ – ये बात अच्छी नहीं है। हाँ, यद फर्क अपने को समझना है। विशिष्ट होना बुरा नहीं है किन्तु विशिष्टता की आकांक्षा या विशिष्ट कहलाने का जो भाव है वह हमारे अंदर अंहकार उत्पन्न करता है। मीडिया प्रभारी निलेश कुमार जैन ने बताया कि पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन शुक्रवार को श्री दिगंबर जैन पंचायती मंदिर के अंतर्गत श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर, श्री दिगंबर चंद्रप्रभु जैन मंदिर, भगवान महावीर स्वामी जल मंदिर, श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर सहित अन्य सभी जैन मंदिर में उत्तम मार्दव धर्म के अवसर पर जिनेन्द्र प्रभु का जलाभिषेक, भव्य पंचामृत अभिषेक, दशलक्षण पूजन, शांतिधारा, मंगल आरती का विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ।
