
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)29 अगस्त। स्थानीय जेल रोड स्थित श्री दिगंबर जैन चंद्रप्रभु मंदिर में चातुर्मास कर रहे दिगंबर जैन मुनि श्री 108 विशल्य सागर जी महाराज पर्युषण महापर्व के अवसर पर वृहस्पतिवार को धर्मसभा में उन्होंने बताया कि क्रोध तात्कालिक पागलपन है, उत्तेजना में किया गया एक दृष्कृत्य है, एक उफान है, एक तूफान है पर ध्यान रखना “उतावलेपन में किया गया कार्य तात्कालिक आनंद प्रदान करता है पर अपने पीछे अनंत पश्चाताप को छोड़कर चला जाता है इसलिए क्रोध को जहर कहा है, बेहोशी कहा है, अग्नि की ज्वाला कहा है, आत्मा में पनपता नासूर कहा, मस्तिष्क की विक्षिप्तता कहा, क्षय रोग कहा क्योंकि यह क्रोध जीव को मारता है, जलाता है, तड़पाता है, पागल बनाता है, शरीर को खोखला करता है, अकुलाहट पैदा करता है, निर्मल यश को धूमिल करता है, मन, वचन, काय से नियन्त्रण को हटाता है, प्रेम -भाव को तिरोहित करता है। यह क्रोध महा भयंकर है। यह क्रोध अपना तथा अन्य का भी घात करता है, धर्म को छोड़ता है, पाप का आचरण करता है, उचित की पूजा में विघ्न डालता है, निन्दनीय वचन बुलवाता है यानि क्रोध न करने योग्य समस्त क्रिया करवा देता हैं, इसलिए जबतक भीतर क्रोध रहता है तब तक हमारी सारी क्रिया अस्त-व्यस्त रहती है। कभी आपने विचार किया कि क्रोध क्यों आता है? छोटा सा समाधान है। जहाँ अप्रेक्षा की उपेक्षा होती है वहीं क्रोध आता है, जहाँ ‘मैं’ को चोट लगती हैं वहीं क्रोध आता है, जहाँ मनोनुकूल क्रिया नहीं होती है। वहीं क्रोध आता है क्योंकि मनुष्य की प्रवृत्ति है, वह जैसा चाहता है वैसा ही पाना चाहता है। अगर वैसा न मिले तो क्रोध बाहर आ जाता है।
क्रोध धैर्य को नष्ट कर देता है, क्रोध शास्त्र ज्ञान को नष्ट कर देता है, क्रोध सब कुछ नष्ट कर देता है, क्रोध के समान कोई शत्रु नहीं है। वास्तव में आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु है क्रोध ! यह आत्मा के गुणों का हनन करके चतुर्गति में भ्रमण कराने में सहायक है। क्रोध के वेग में बुद्धि कुण्ठित हो जाती है वह हिताहित के ज्ञान से शून्य हो जाती है। क्रोधी तो आत्मीय जनों का भी लिहाज नहीं कर पाता क्योंकि क्रोध के हृदय से प्रेम की रसधारा सूख जाती है। क्रोध में पिता-पुत्र का, भाई-भाई का, गुरु-शिष्य का, मित्र-मित्र का भी शत्रु बन जाता है। बहुत समय से चलने वाला प्रेम भी क्रोध के कारण क्षण में ही घृणा में परिवर्तित हो जाता है। परिणाम यह होता है कि क्रोधी व्यक्ति अपने जीवन काल में तो निंदा का पात्र होता ही है। मरणोपरांत भी उसे घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। इसलिए अपने जीवन में कैसा भी क्रोध का निर्मित्त मिले, सत जैसे हो जाओं – सन्तों को बाहर से कितना भी क्रोध का निमित्त मिले परन्तु वे अपने क्रोध को प्रकट नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि – ” क्रोध करना स्वबोध खोना है।
