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भगवत प्राप्ति के लिए भक्ति मार्ग सबसे श्रेष्ठ : श्री जीयर स्वामी जी महाराज

RKTV NEWS/परमानपुर (रोहतास)10 अगस्त।परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्नम जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि भक्ति एकमात्र ऐसा साधन हैं, जिसके माध्यम से मनुष्य भगवान के धाम को प्राप्त कर सकता है। भक्ति के माध्यम से जब कोई भी व्यक्ति भगवान में लीन हो जाता है, तब उसमें किसी भी प्रकार से भटकने की संभावना नहीं होती है। श्रीमद् भागवत कथा अंतर्गत गंगा के पावन तट पर राजा परीक्षित शुकदेव जी से पूछ रहे हैं कि ऋषिवर जिनका मरना तय हो गया है, उसे क्या करना चाहिए।
वहीं पिछले कई दिनों से शुकदेव जी राजा परीक्षित को मंत्र योग, लय योग, हठयोग, राजयोग एवं और भी कई मार्गों पर प्रकाश डाल रहे हैं। लेकिन शुकदेव जी कहते हैं कि राजा परीक्षित हमने तुम्हें जितने भी योग बताए है, उसमें व्यक्ति कभी-कभी भटक सकता है। लेकिन भक्ति एक ऐसा माध्यम है जिसके माध्यम से व्यक्ति के अंदर अहंकार, द्वेष, क्रोध, लोभ, लालच नहीं होता है।
भगवत प्राप्ति के लिए और भी जितने मार्ग बताए गए हैं, उनमें हम भगवान को पकड़ने का प्रयास करते हैं। लेकिन उसमें कभी-कभी छूटने की संभावना हो सकती है। क्योंकि जब हम किसी चीज को पकड़ने का प्रयास करते हैं तो वह छूट सकता है। लेकिन जब परम ब्रह्म परमेश्वर भगवान श्रीमन नारायण जिसको पकड़ लेते हैं वो कभी नहीं छूटता है। भक्ति मार्ग में लेने और देने की परंपरा नहीं है। इसमें एकमात्र शरणागति होता है।
न हमें दुनिया से कुछ लेना है, न हमें किसी के प्रति द्वेष है, न किसी के प्रति अहंकार है, न हम किसी वस्तु को अपना मानते हैं, न हम किसी को पराया समझते हैं। भक्ति मार्ग में सब कुछ एक समान होता है। इसलिए भक्त भगवान के हृदय में वास करते है।
भक्ति में भक्त अपने स्वामी से किसी भी प्रकार की डिमांड नहीं करता है। वह एक मात्र अपने स्वामी के लिए बस देना चाहता है। जिस प्रकार से भगवान श्री राम के प्रति भरत का समर्पण था। उसी प्रकार से भक्ति करने को बताया गया है। भरत ने भगवान श्री राम के प्रति समर्पण रखा था। जब श्री राम जी वन में चले गए थे, तब भरत जी उनको वापस अयोध्या लाने के लिए विवस कर रहे थे।
उस समय राजा जनक ने भरत को भक्ति मार्ग का शिक्षा दिए थे। राजा जनक ने कहा था भरत भक्ति में भक्त भगवान से कुछ मांगता नहीं है। बल्कि उनके चरणों में अपने आप को समर्पित करता है। इसीलिए तुम भी भगवान श्री राम के चरणों में अपने आप को समर्पित करो।
श्री राम जो तुमको आज्ञा देते हैं उसका पालन करो। उस समय भरत के मन में जितने का भाव था, वह समाप्त हो गया। इसीलिए भक्ति मार्ग को श्रेष्ठ बताया गया है। जिस प्रकार से बिल्ली अपने बच्चे को पकड़ती है। उसी प्रकार से जब भगवान अपने भक्तों को पकड़ लेते हैं, तो उसके गिरने की संभावना खत्म हो जाती है।
भगवान की पूजा के लिए यज्ञ, दान इत्यादि किया जाता है। लेकिन इसमें अहंकार आने की संभावना होती है। दान करने से व्यक्ति के मन में अहंकार आ सकता है कि हम सबसे बड़े दानी हैं। कई बार बड़े-बड़े राजा को भी अहंकार आ गया है। एक बार एक राजा बहुत बड़े दानी थे। वह गायों को दान करते थे। अचानक एक ब्राह्मण की गाय रास्ता भटकते हुए राजा के गायों के झुंड में चली गई। राजा उन झुंडों में उन ब्राह्मण के गाय को नहीं पहचान पाए।
राजा हर दिन गायों को दान करते थे। ब्राह्मण के गायों को भी अपना समझकर राजा दान कर दिए। ब्राह्मण अपने गायों को ढूंढते ढूंढते वहां पहुंचे। देखे कि मेरी गाय को एक व्यक्ति लेकर के जा रहा है। ब्राह्मण देवता ने कहा आप मेरे गाय को बिना अनुमति के कैसे लेकर जा रहे हैं। उस व्यक्ति ने कहा यह गाय राजा ने मुझे दान दिया है। ब्राह्मण देवता ने कहा कि मेरे गाय को राजा कैसे दान दे सकता है। आप मेरे साथ चलो। वही दोनों लोग राजा के पास पहुंचे।
ब्राह्मण ने कहा कि राजा आप मेरे गाय को बिना मेरे अनुमति के दान कैसे कर दिए। राजा ने कहा कि ब्राह्मण देवता ठीक है, आपके गाय को हमने दान कर दिया है। आप दूसरी गाय मेरे पास से लेकर के जाइए। मेरे पास गाय की कोई कमी नहीं है। आप जीतना चाहते हैं, उतना गाय लेकर जाइए। वह ब्राह्मण देवता स्वाभिमानी थे। दान दक्षिणा नहीं लेते थे। अपने कर्म के अनुसार मेहनत करके जीवन जीने वाले व्यक्ति थे।
उन्होंने कहा कि राजा हम आपसे दूसरी गाय नहीं लेंगे। मेरी जो गाय हैं, वहीं गाय आपको लौटाना पड़ेगा। राजा जिसको दान दिए थे, उससे बोले आप दूसरी गाय ले लीजिए, और उस गाय को लौटा दीजिए। जिस व्यक्ति ने गाय को लिया था, उसने कहा कि नहीं नहीं हम जिस गाय को लिए हैं, वहीं गाय रखेंगे। हम इस गाय को लेकर जाएंगे। आप दूसरी गाय ब्राह्मण को दे दीजिए। अब वहां पर कोई मानने को तैयार नहीं था।
राजा को गुस्सा आ गया और ब्राह्मण देवता को बुरा कहने लगे। आपने एक गाय के लिए इतना अभिमान किया है। हम हर दिन हजारों गायों को दान करते हैं। इस प्रकार से भले बुरे शब्दों का प्रयोग करने लगा। ब्राह्मण देवता भी स्वाभिमानी थे। गुस्से में आकर के ब्राह्मण देवता ने कहा राजा तुम्हारे द्वारा दान किए गए गायों का कोई महत्व नहीं है। क्योंकि तुम्हारे अंदर अभिमान कूट-कूट कर भरा हुआ है। ऐसे दान का कोई मतलब नहीं होता है।
इसीलिए जीवन में दान करने से कभी-कभी अहंकार आने की संभावना बनी रहती है। यज्ञ करने पर भी अहंकार आने की संभावना होती है। क्योंकि उस समय भी व्यक्ति को यह ऐसा अभिमान हो सकता है कि हम यज्ञ करा रहे हैं। उसमें भटकाव की संभावना हो सकती है। लेकिन भक्ति मार्ग एक ऐसा मार्ग है। जिससे मनुष्य सब कुछ होने के बाद भी किसी वस्तु को अपना नहीं समझता है। वह भगवान का वस्तु समझता है। भगवान ही एकमात्र उसे दिखाई पड़ते हैं। चाहे वह वस्तु अलग-अलग प्रकार का हो सकता है।
राजा नहुष पृथ्वी पर इतना यज्ञ, हवन, दान किए, जिसके कारण इंद्र के गद्दी को भी प्राप्त कर लिए। वही राजा नहुष जब इंद्र की गद्दी को प्राप्त किए, तब इंद्रलोक के सभी वस्तुओं को भी प्राप्त कर लिए। राजा नहुष के जितने भी मंत्री थे, कहने लगे कि महाराज जब इंद्रलोक आपका हो गया तब इंद्र की पत्नी भी आपकी हुई। इस प्रकार से राजा नहुष के मंत्रियों ने इंद्र की पत्नी के पास जाकर कहा कि आप राजा नहुष की पत्नी बनना स्वीकार कर लीजिए। इंद्र की पत्नी इस बात को सुनकर काफी दुखी हुई।
उसी समय बृहस्पति जी आ गए। इंद्र की पत्नी ने बृहस्पति जी से कहा बाबा हम बहुत संकट में हैं। मुझे कुछ उपाय बताइए। वही बृहस्पति जी कहते हैं कि आप सहमति दे दीजिए। क्योंकि कभी-कभी दुष्टों् के आचरण व्यवहार को भी कुछ समय के लिए मानना पड़ता है। वही इंद्र की पत्नी ने मंत्रियों से कहा ठीक है लेकिन राजा नहुष को बताना कि मेरा एक शर्त है। हम राजा नहुष की पत्नी तो बनेंगे, लेकिन हम उस डोली में जाएंगे जिस डोली पर आज तक कोई दूसरा नहीं बैठा हो तथा उस डोली का कहार वहीं बनेगा जो पहले कहीं पर भी कहारी का काम नहीं किया हो। अब इंद्रलोक का राजा नहुष ने नया डोली बनवाया। जिसके बाद कहार की प्रतीक्षा कर रहा था कि किसको कहार बनाया जाए। तब तक उधर पृथ्वी लोक में जो सप्तऋषि थे, जिन्होंने यज्ञ इत्यादि कर करके राजा नहुष को इंद्रलोक की गद्दी प्राप्त करवा दिए थे। वह सप्तऋषि कहते हैं कि चलिए चला जाए इंद्रलोक में राजा नहुष कैसे रह रहे हैं उनका समाचार प्राप्त किया जाए।
वहीं सप्तऋषि लोग इंद्रलोक में पहुंचे। राजा नहुष ने देखा कि सप्तऋषि आ रहे हैं। अभी वे लोग बहुत दूर थे तब तक ही वह डंडे की तरह सो करके प्रणाम करने लगा। इधर सप्तऋषि लोग बहुत प्रसन्न हो हुए कि राजा नहुष हम लोग इतना दूर है पहले से ही साष्टांग कर रहा है। सप्तऋषि लोग पास पहुंचे फिर भी वह उठ नहीं रहा था। स्वामी जी ने कहा कि अचानक कभी-कभी कोई व्यक्ति आपसे ज्यादा प्रेम और स्नेह दिखाने लगे तो समझ जाना चाहिए कि आपके साथ कुछ धोखा होने वाला है।
इसलिए वैसे व्यक्तियों से सतर्क हो जाना चाहिए। अब सप्तऋषि लोग कहने लगे राजा वरदान मांगो वरदान मांगो। राजा नहुष कह रहा था नहीं महाराज आप लोग पहले विराजमान हो जाइए। हम आपके पैरों को धोएंगे। स्वागत करेंगे, सत्कार करेंगे। लेकिन सप्तऋषि लोग प्रसन्न हो गए हैं। बार-बार कह रहे थे कि वरदान मांगो और राजा नहुष सप्त ऋषियों से कहा कि आप लोग 5 मिनट के लिए मेरा कहार बन जाइए। इस बात को सुनकर के सप्तऋषि बहुत ज्यादा मन ही मन दुखी हुए। उसमें बड़े-बड़े ऋषि थे। विश्वामित्र, गौतम ऋषि, वशिष्ठ ऋषि, भृगु ऋषि, इत्यादि थे।
अब मन ही मन ऋषि लोग सोच रहे थे कि किस जन्म के पाप का बदला आज राजा नहुष हम लोगों के साथ ले रहा है। बताइए आज तक हम लोग कहारी का कभी काम नहीं किए हैं। राजा नहुष अपने पालकी में बैठ गया और सप्तऋषियों को कहार बना करके चल दिया। रास्ते में ऋषि लोग से कह रहा था कि जल्दी चलिए, जल्दी चलिए। एक बार तो राजा नहुष ने विश्वामित्र मुनि को अपने पैरों से भी जोर से धक्का दिया। जल्दी चलिए धीरे-धीरे चल रहे हैं। अब सप्तऋषि लोग गुस्सा हो गए, श्राप दे दिए जाओ मरकर सांप बन जाना। वहीं सप्तऋषियों के श्राप से राजा नहुष जो इंद्र की गद्दी प्राप्त किया था, वह मर करके अगले जन्म में सांप बन गया। इसलिए कहा गया है कि जब दान, पूजा, पाठ में आपको अहंकार आने की संभावना होती है, उस अहंकार के कारण आपका सर्वनाश हो सकता है। लेकिन भक्ति मार्ग में भटकने की संभावना बिल्कुल नहीं है।

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