
RKTV NEWS/व्यंग्य (डॉ मीरा सिंह “मीरा”)08 अगस्त।सच ही कहते हैं “सब दिन होत ना एक समान” मैं भारतीय डाक विभाग की बात कर रही हूं जो अपनी उत्पत्ति से अब तक के सबसे विश्वसनीय हरकारा की भूमिका निभाते रहा।बहुत सहजता से भौतिक दूरियों को पाटकर बिना कुछ कहे हमारे रिश्ते-नातों को पोषण करते रहा। अपनी कार्यशैली के बदौलत जनता के दिल में विशेष स्थान बनाने में सफल रहा।वो दिन आप भी नहीं भूलें होंगे जब अचानक गली या मोहल्ले में ट्रिन-ट्रिन की आवाज सुनते पूरे घर में हलचल सी मच जाती थी।मन में कितनी यादें करवट बदलने लगती थी।कितने सपने अंगड़ाई लेने लगते थे।कइयों के दिल की धड़कन बढ़ जाया करती थी।नई दुल्हन खिड़की से बाहर झांक कर देखती थी “कहीं मुंशी जी उनकी चिठ्ठी तो नहीं लाएं हैं?एक ट्रिन की आवाज से जीवन में खुशहाली आ जाया करती थी। मायूस मन में अचानक उत्सवी माहौल हो जाता था।खुशियां हिलोरे लेने लगती थी।अंधे माता- पिता की आंखों में चमक आ जाया करती थी।ड्योढ़ी की ओट में छिपी दीदी की धड़कनें बेकाबू हो जाती थी। उन दिनों डाकिया बाबू चिठ्ठी नहीं, चिठ्ठी में धड़कता दिल, महकते एहसास लेकर आते थे।
रक्षाबंधन के त्योहार में डाक विभाग की अहमियत से बच्चा -बच्चा वाकिफ था।दूर देश में ब्याही बहनें अपने प्यारे भाई को स्नेह का प्रतीक राखी डाक से ही तो भेजती थी।डाक सेवा पर देशवासियों को पूरा विश्वास रहा है।रहे भी क्यों नहीं,भाई देश के किसी भी कोने में हो,डाक विभाग अपना फर्ज मुस्तैदी से निभाते आया था।डाकिया बाबू बहन का प्यार पहुंचाने में कभी नहीं चूके थे।पर इस वर्ष ऐसा नहीं हुआ नहीं कुछ करिश्मा होने की उम्मीद है।दरअसल इस पावन त्योहार के पूर्व डाक विभाग अपने कुछ असंवेदनशील आला अधिकारियों के फैसलों के आगे विवश है।

नया साफ्टवेयर रिश्तों के बीच दीवार बनकर खड़ा हो गया।कई लोग राखी रजिस्ट्री करने आ रहे हैं और मायूस होकर घर लौट रहे हैं। जबकि कुछ लोग आक्रोशित होकर डाक कर्मियों से लड़ाई-झगड़ा भी करने लगे रहे हैं।बाहर खड़ा लेटर बाक्स मन ही मन दुखी है।अकेले टुकुर-टुकुर सब तमाशा देख रहा है। विभागीय नियमानुसार नए साफ्टवेयर से ही डाक विभाग के सभी कार्य संपन्न होना है पर तकनीकी जटिलताओं के कारण साफ्टवेयर काम ही नहीं कर पा रहा है।इस कारण कई राखियां जहां की तहां पड़ी है।कुछ घर में तो कई बीच राह में अटकी अपने गंतव्य तक पहुंचने का इंतजार कर रही हैं। पहुंचेगी या??? मुआ साफ्टवेयर को आना ही था तो रक्षाबंधन के कुछ पहले आया होता या फिर बाद में, अभी आकर रिश्तों में दरार डालने की क्या आवश्यकता थी?
