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घूंघट से बैंकिंग तक: रोइनेट की ‘बीसी-सखी’ पहल से बदल रही हैं ग्रामीण महिलाओं की ज़िंदगी।

नई दिल्ली/राहुल ढींगरा 30 जुलाई।भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ रही है। इसके बाद भी इसका लाभ सभी को समान रूप से नहीं मिल रहा। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं अब भी इन सुविधाओं से वंचित ही हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं — केवल 25% महिलाएं ही इंटरनेट का उपयोग करती हैं, वहीं पुरुषों में यह संख्या 49% है। यह डिजिटल लैंगिक अंतर ग्रामीण इलाकों में और भी गंभीर हो जाता है, जहाँ सामाजिक-सांस्कृतिक पाबंदियाँ, आर्थिक सीमाएँ और डिजिटल उपकरणों की कमी महिलाओं को डिजिटल भागीदारी से दूर रखती हैं।
इन्हीं चुनौतियों को दूर करने के लिए गुरुग्राम की फिनटेक कंपनी ‘रोइनेट’ ने मई 2020 में ‘बीसी-सखी’ पहल की थी। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों की महिलाओं को बैंकिंग संवाददाता (बैंकिंग कॉरस्पॉन्डेंट्स) के रूप में प्रशिक्षित करना है, ताकि वे अपने समुदायों को घर-घर जाकर वित्तीय सेवाएं उपलब्ध करा सकें।
इन महिलाओं को स्मार्टफोन, बायोमेट्रिक माइक्रो-एटीएम और एक यूज़र-फ्रेंडली ऐप से लैस किया गया है, जिससे वे डिजिटल तौर पर सशक्त बनें। यह पहल सिर्फ 105 बीसी-सखियों से शुरू हुई थी, वहीं आज यह आंकड़ा 10,000 से अधिक सक्रिय बीसी-सखियों तक पहुँच चुका है। इनमें से कई महिलाएं पहली बार आय अर्जित कर रही हैं और ₹10,000 से ₹50,000 प्रति माह तक कमा रही हैं। रोइनेट का विजन “फिजिटल” (Phygital) है — यानी फिजिकल (प्रत्यक्ष) उपस्थिति और डिजिटल टूल्स का संयोजन, जो ग्रामीण भारत की ज़मीनी हकीकतों के अनुसार काम करता है।
इस पहल से जुड़कर बदलाव लाने वाली कहानियां बेहद प्रेरणादायक है। वाराणसी की 35 वर्षीय जयलक्ष्मी देवी की हो लो। जब बीसी-सखी बनीं तब उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता था। वह कहती हैं, “लोग कहते थे कि यह क्या सिखाएगी बैंकिंग? लेकिन आज स्थिति यह है कि उनके सारे वित्तीय कामकाज मैं ही संभाल रही हूं।” स्नातक और दो बच्चों की मां 36 वर्षीय रिया शर्मा की कहानी भी जुदा नहीं है। उन्होंने बीसी-सखी बनने से पहले कभी कहीं काम नहीं किया था। आज वह अपने परिवार के सहयोग से 14 से 15 हजार रुपए प्रतिमाह कमा रही है। वह कहती हैं कि “यह सब संभव हो सका क्योंकि मैंने सही दिशा में अपना पहला कदम बढ़ाया था।”
रोइनेट के संस्थापक और प्रबंध निदेशक, समीर माथुर, कहते हैं कि शुरू में ग्रामीण भारत में महिलाओं के बैंकिंग सेवाएं देने की अवधारणा को लेकर संदेह था। “लोग पूछते थे, ‘घूंघट में रहने वाली महिला बैंकिंग सेवा कैसे देगी?’ लेकिन हमने इन महिलाओं में सीखने, कमाने और समाज में अपनी पहचान बनाने की ललक देखी।” उनके अनुसार, बीसी-सखी बनना कई महिलाओं के जीवन में एक मोड़ साबित हुआ। वह कहते हैं, “अब वह सिर्फ किसी की पत्नी या माँ नहीं है, वह एक बैंकर है। यह उसकी पहचान को और खुद की नजर को बदल देता है।”
समय के साथ, बीसी-सखियाँ विश्वसनीय वित्तीय सलाहकार और समुदाय की प्रभावशाली प्रतिनिधि बन गई हैं। माथुर कहते हैं, “कुछ महिलाएं तो शुरुआत में बोलने से भी डरती थीं। हमें ऐसे वातावरण तैयार करने पड़े, जहाँ वे खुद को पेशेवर के रूप में देख सकें।” इसका असर पीढ़ियों तक पहुँच रहा है। उनका कहना है, “हमारी एक बीसी-सखी ने बताया कि उसका बेटा अब बैंकर बनना चाहता है क्योंकि उसकी माँ बैंकिंग सेवाएं देती है।” माथुर के शब्दों में, “असल प्रगति तो तब होती है जब एक महिला, जिसने पहले कभी स्मार्टफोन नहीं छुआ, अब अपने पड़ोसियों को बीमा के बारे में सलाह दे रही है। यही कहानी हम रचना चाहते हैं।”

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