
RKTV NEWS/पीरो ( भोजपुर)14 जुलाई।परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम स्कंद के प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक की चर्चा करते हुए कहा कि सत्य ही परमात्मा जगत के पालन कर्ता ईश्वर हैं।
वेदो व्यास जी के द्वारा रचित श्रीमद् भागवत के पहले श्लोक में सत्यम परम धीमहि: कहा गया है। जिसका मतलब जो सत्य है वही ईश्वर है जो सत्य है वहीं परमात्मा है। जो सत्य है वही जगत के पालन कर्ता है। व्यास जी ने पहले श्लोक में किसी का भी नाम नहीं लिया हैं।
स्वामी जी ने कहा कि व्यास जी अगर कृष्ण जी का नाम ले लेते तो कृष्ण के भक्त कहते की कृष्ण जी भगवान हैं। यदि श्री राम का नाम लेते हैं तो उनके भक्त कहते कि श्री राम ही ईश्वर हैं। इसी प्रकार से नारायण, श्री लक्ष्मी नारायण के अलावा भगवान विष्णु के जितने भी अवतार हुए हैं।
उन अवतार में भगवान के अलग-अलग नाम से लोग स्मरण करते हैं। यदि पहले श्लोक में व्यास जी के द्वारा किसी का भी नाम लिया जाता तो उस पर विवाद होने की संभावना थी। इसीलिए व्यास जी ने पहले श्लोक में सत्य को ही परमात्मा कहा है।
अब वह सत्य कौन हैं, भगवान श्रीमन नारायण। जो कि सतयुग में नारायण के नाम से जाने जाते थे। त्रेता युग में श्री राम के नाम से जाने गए। द्वापर युग में श्री कृष्ण के नाम से जाने गए। वहीं अलग-अलग अवतारों में भगवान के अलग-अलग नाम से जाने गए। भगवान श्रीमन नारायण के नाम तो अलग-अलग हैं। लेकिन उनका स्वरूप एक ही है। सृष्टि पर मानव के कल्याण के लिए भगवान अलग-अलग रूप में अवतार लिए हैं।
मीडिया संचालक रविशंकर तिवारी ने बताया की स्वामी जी ने कहा कि व्यास जी के द्वारा पहले भी 17 पुराणों की रचना की गई थी। जिसमें उन्होंने अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग भगवान की चर्चा की है। जिसमें गरुड़ पुराण में गरुण भगवान को सर्वश्रेष्ठ बताया गया। वही सूर्य पुराण में सूरज भगवान को श्रेष्ठ बताया गया। इसी प्रकार से जितने भी अलग-अलग ग्रंथों की रचना की गई। उसमें अलग-अलग भगवान बताए गए। जिसके बाद से इस पृथ्वी पर सब भगवान के अलग-अलग भक्त हो गए। आपस में लोग विवाद करने लगे कि सबसे बड़े सूर्य भगवान हैं तो कोई कहता कि सबसे बड़े गरुड़ भगवान है। कोई कहता कि दुर्गा जी है तो कोई कहता है कि शिवजी सबसे बड़े भगवान हैं। इस प्रकार से लोग आपस में झगड़ने लगे। जिसके कारण ही व्यास जी को 17 पुराणों की रचना करने के बाद भी मन में शांति नहीं थी।
इसीलिए नारद जी के द्वारा व्यास जी को समझाया गया। जिसके बाद व्यास जी ने श्रीमद् भागवत की रचना की। जिसमें उन्होंने अलग-अलग नाम से परिभाषित भगवान ईश्वर को सत्य नाम से समझाया है।
अब सत्य कौन है। सत्य वही है जो सृष्टि के पहले भी थे जो सृष्टि के बाद भी हैं और जो सृष्टि खत्म होने के बाद भी रहेंगे। वहीं सत्य हैं वहीं ईश्वर है वही जगत के पालन कर्ता है। वही जगत के संचालन कर्ता है। वही जगत के संघार कर्ता भी हैं। जिनको हम लोग नारायण, श्री कृष्ण, राम इत्यादि के नाम से जानते हैं।
स्वामी जी के द्वारा श्रीमद् भागवत के प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्लोक की व्याख्या विस्तार से की गई। जिसमें भगवान के स्वरूप लीला इत्यादि का वर्णन किया गया।
मानव जीवन में धर्म का महत्व
स्वामी जी ने बताया कि महर्षि वेदों व्यास ने श्रीमद् भागवत महापुराण में प्रारंभ में भी धर्म का प्रयोग किया है। मध्य में भी धर्म का प्रयोग किया है और अंत में भी धर्म का प्रयोग किया है। स्वामी जी ने बताया कि इससे मालूम होता है कि हमारे जीवन में धर्म का कितना महत्व है। अब सवाल यह उठता है कि धर्म किसे कहते हैं तो जो व्यक्ति सत्य के पथ पर चलकर अपना जीवन व्यतीत करता है उसी को धर्म कहा जाता है। धर्म हिंसा को नहीं कहा जाता है। धर्म का 10 लक्षण है। धर्म के 10 लक्षण होते है घृति क्षमा दमो अस्तेयम, शौच इंद्री निग्रह। धीर विद्या सत्य कोधम दसकम लक्ष्मणम। धर्म को परिभाषित करते हुए स्वामी जी ने बताया कि मंदिर में जाना धर्म है। गंगा स्नान करना धर्म है। यज्ञ साधना पूजा करना धर्म है।
