
समस्तीपुर/बिहार (डॉ परमानन्द लाभ)12 अप्रैल।पुराणों के अनुसार राम के भक्तों में शंकर का स्थान सबसे प्रमुख है। एक बार रामकथा के आदि प्रवर्तक शिव ने राम की भक्ति दास्यभाव से करने की इच्छा प्रगट की थी और उनकी अतिशय उत्कंठा के मध्यनज़र राम ने उन्हें अपनी भक्ति का वरदान दिया था। समयान्तराल में वे हीं शिव भक्त रुद्रावतार हनुमान के रुप में दास्यभाव की भक्ति सम्पन्न की। यह भक्ति हनुमान के उपासक रुप को दर्शाती है।
आदि ग्रंथ वाल्मीकि रामायण के मुताबिक हनुमान उपास्य स्वरूप में सर्वगुण सम्पन्न थे।
संत एकनाथ रचित भावार्थ रामायण में लिखा है कि हनुमान का जन्म उनकी माता अंजनी द्वारा यज्ञपायस का अंश खाने से हुआ था,इसलिए उनमें देवत्व का आना स्वाभाविक है। इसके बावजूद हनुमान का स्थान राम के हृदय में था। इसका प्रमाण वाल्मीकि रामायण में मिलता है कि राम-राज्याभिषेक के उपरांत जब सबकी विदाई राम ने की, तब हनुमान ने वर मांगा था-
स्नेहो मे परमो राजस्त्वयि तिष्ठतु नित्यदा।
भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु। ।
यावद् रामकथा वीर चरष्यति महीतले।
तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न संशय: ।।
इस पर राम ने वैसा ही आशीर्वाद के साथ अपने गले का हार दे दिया। यह सच है कि राम की उपासना हनुमान के बिना अधूरी रहती है।
हनुमान की उपासना शक्ति-देवता के रुप में स्वतंत्र रुप में भी होती है। अध्यात्म रामायण कहता है कि उन्हें अपने दासत्व का भान था और उपासक स्वरूप पर गौरव था। तुलसीदास लिखते हैं-
उमा न कछु कपि कै अधिकाई।
प्रभु प्रताप जो कालहिं खाई। ।
हनुमान का प्रताप राममिलन के बाद हीं उजागर होता है। वे राम – सेवक के रुप में हीं उभरे, ‘ राम ते अधिक राम कर दासा ‘ बने।
वल्लभ सम्प्रदाय ने भक्तों के चार प्रकार- शुद्ध पुष्ट, पुष्टि पुष्ट,मर्यादा पुष्ट और प्रवाह पुष्ट माना है, उसमें हनुमान शुद्ध पुष्ट भक्त हैं। यही कारण है कि हनुमान और लक्ष्मण दोनों शेषावतार की श्रेणी में आते हैं।
हनुमान का उपासक स्वरूप बलवत्तर था और इसी आधार पर गोस्वामीजी ने उनके वातजात रुप और रघुपतिप्रिय भक्त रुप की वंदना की है।
अतुलित बलधामम्, हेमशैलाभदेहं, दनुजवन कृशानुं, ज्ञानिनाम् अग्रगण्यं, सकलगुण निधानम्, वानराणामधीशं और रघुपति वरदूतं आदि हनुमान की विशेषताएं थीं तथा इन्हीं वजहों से वे राम के श्रेष्ठ भक्त बन सके।
तुलसीकालीन वक्त की मांग थी कि हनुमान के शक्तिशाली रुप को समाज व राष्ट्र के सम्मुख रखा जाए।
राम की एकनिष्ठ भक्ति हनुमान ने की थी। राम ने युद्ध के समस्त साथियों को जब समुचित उपहारों से अनुगृहित किया और हनुमान वंचित रह गए, तब सीता असह्य हो गई और वह अपना बहुमूल्य हार हनुमान को अर्पित कर दी। प्रफुल्लित हनुमान का भयाक्रांत विस्मय अदमनीय हो गया और उन्होंने उसकी एक-एक मणि दांत से पीस डाली। लक्ष्मण कुपित हुए। स्वयं राम ने इसका कारण हनुमान से पूछा, तो उनका सीधा उत्तर था- इसके भीतर मेरे सृजनहार प्रभु का नाम अंकित नहीं है। इसपर लक्ष्मण का वार हुआ- क्या तुम्हारे हृदय में रामनाम अंकित है?
‘ जाकी रही भावना जैसी, प्रभुमूरत देखी तिन्ह तैसी ‘।उपस्थित भक्तों ने हनुमान के हृदय में राममूर्ति के दर्शन किए।
इसप्रकार हनुमान का उपासक रुप हीं वाल्मीकि रामायण में उभर कर आया है। राम ने हनुमान को भक्त श्रेष्ठ मानकर ‘रामगीता’ सुनाई थी। श्रोता हनुमान थे। लेकिन, सच यह है कि यही श्रेष्ठता उन्हें उपास्य की श्रेणी में बैठाती है।
अर्जुन के रथ के झंडे पर हनुमान थे। यह उनका उपास्य स्वरूप हीं है।
पुराणों और रामायणों में हनुमान के अद्भुत चरित्रों का उल्लेख मिलता है। एकतरफ इनमें हनुमान के भक्त रूप को प्रभावशाली ढंग से उपस्थित किया गया है, तो दूसरी ओर उनके उपास्य स्वरूप का भी वंदन किया गया है।
भारत के उत्तर भाग में हनुमान की पूजा का आधार गोस्वामी तुलसीदास को माना जा सकता है, तो दक्षिण में समर्थ रामदास को। तुलसी ने हनुमान की उपासना सख्य भाव के साथ-साथ सेवक- सेव्य भाव से भी की।
रामानंद ने भी हनुमान की उपासना की है। उन्होंने हनुमान की अराधना से मनुष्य को परम पद पाने का अधिकारी बताया है।
सारत: यह कहा जा सकता है कि हनुमान के वर्तमान उपास्य स्वरूप की परंपरा रामायण काल से हीं चली आ रही है। परंतु, यह सच है कि हनुमान की श्रेष्ठता का कारण उनकी राम-भक्ति हीं है। एक आदर्श भक्त को कैसे उपास्य स्वरूप की प्राप्ति होती है, इसका उदाहरण हनुमान के सिवा अन्यत्र नहीं मिल सकता।
आज हनुमान-जयंती के मौके पर भारत की खुशहाली की अनंत कामनाओं के साथ इन्हें शत-शत नमन।

