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अनायास:इसी दृष्टि सम्पन्नता से कृष्ण दयाल बाबू को और कहानियाँ लिखनी चाहिए: जितेंद्र कुमार

RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)12 मई।डॉ कृष्ण दयाल सिंह की नाटक और कहानी संग्रह “अनायास”पर जितेंद्र कुमार ने अपनी सकारात्मक टिप्पणी लिखते हुए लेखक से ऐसी ही और लेखनी की इच्छा जताई है।

कृष्ण दयाल सिंह के नाटकों की रंग-परिकल्पना

भारतीय साहित्य में जन-आकांक्षाओं को प्रकट करने के लिए नाटक सशक्त माध्यम रहा है। संस्कृत में बहुत सुप्रसिद्ध नाटक लिखे गये। पात्र काव्यमय संवाद बोलते थे। क्योंकि जब तक संवाद सुंदर एवं आकर्षित करनेवाले, गहरे भाव वाले नहीं होते स्रोता प्रभावित नहीं होते। आधुनिक हिन्दी नाटकों में ‘सत्य हरिश्चन्द’ काफी लोकप्रिय रहा है। हरिश्चन्द्र एक ऐतिहासिक मिथक बन गये हैं। वे सत्यवादी थे। सत्य की रक्षा करने हेतु उन्हें अपने को बेचना पड़ा था। जयशंकर प्रसद के नाटक भी काफी प्रभावशाली रहे हैं।
कृष्ण दयाल बाबू के संग्रहों में तीन लघु-नाटक संग्रहित हैं: ‘गुलसितां’, ‘नेतागिरी’, ‘नव वर्ष’ । इसके अतिरिक्त इस संग्रह में एक कहानी ‘पहिल रोपना’ और एक व्यंग्य कविता ‘थैला-पैसा द्वंद’ भी है। ‘गुलसितां’ लघु-नाटक में अस्पताल के अमानवीय वातावरण का जीवन्त चित्रण है। छोटा बच्चा ज्वर के साथ पतले दस्त की शिकायत से पीड़ित है। डॉक्टर ड्रग एजेंट द्वारा दिये गये सैम्पुल दवाओं की बात नर्स से करता है। नर्स को कलाई घड़ी उपहार में देने की बात करता है । दवा की दुकान पर आवश्यक दवाइयाँ नहीं मिलती तो नर्स निःसंकोच निजी चिकित्सा केन्द्र पर जाने की सलाह देती है। निजी केन्द्र और दवा की दुकान के क्या रिश्ते हैं, यह बात उजागर हो जाती है। सबसे अच्छी बात है कि कमला की मित्र सईदा है, जो उसका हाल समाचार पूछने आती है। पति तो फरीदकोट में हैं। डा० आशा भले ही अमानवीय हो पर अस्पताल के बाहर विसुन काका और सईदा हैं। सईदा निकाह के समय प्राप्त अँगूठी को बंधक रखने के लिए तैयार है, जिससे मुन्ने की जान बच सके। भ्रष्ट्राचार पर अंकुश एवं सम्प्रदायिक सौहार्द के लिए अनूठी रचना है।
‘नेतागिरी’ इस संग्रह का दूसरा लघु नाटक है। सरकारी विभागों में यूनियन नेता कैसे-कैसे हथकंडे अपनाते हैं, एवं उनका चिंतन एवं सोच कितना अप्रजातांत्रिक होता है, नाटक खोलकर रख देता है। विमलेश डाकघर यूनियन का सचिव है। राकेश उसका साथी कर्मचारी है। वह सामूहिक उत्तरदायित्व की बात सचिव को समझाता है, लेकिन विमलेश कहता है राकेश को कि जब आप ही ठीक हैं तो बाकी को क्या समझना है। डाकघर के भवन स्थानांतररण को रोकने के लिए अध्यक्ष एवं सचिव कर्मचारियों को भड़का रहे हैं। जबकि दो नये पदों के सृजन के पश्चात पुराने भवन में जगह की कमी है। राकेश भेद खोलता है कि सदस्यों की आमराय के बगैर सचिव एवं अध्यक्ष ने संघर्ष की धमकी दे दी है।
मूलचंद बहुत अच्छी बात बोलता है कि संघ एवं प्रशासन एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं। संघर्ष की विफलता के बाद संघ कार्यालय में कर्मचारियों की बैठक में गहन समीक्षा होती है, एवं संघ के कार्य एवं नेतागिरी पर समुद्र-मंथन के पश्चात् मिले रत्नों के समान सकारात्मक विचार उभरकर आते हैं।
तीसरा नाटक ‘नव वर्ष’ है। पिता-पुत्री का संवाद इतना तीक्ष्ण एवं अद्यतन है कि काबिले तारीफ है। भारत की शायद ही कोई समस्या हो जिसकी ओर ‘पिता’ ने पुत्री श्रुति का ध्यान आकर्षित नहीं किया है। पंजाब, कश्मीर, बोडो समस्या, हजरतबल, खेल, महंगाई, पोखरण विस्फोट, विहार की विधि-व्यवस्था, डंकल प्रस्ताव, विदेशी पूंजी निवेश, घोटाला, अपहरण, चुनाव में धांधली, सरसों तेल में मिलावट, आइ ए एस के प्रश्नों का लिकआउट होना। नाटककार कृष्ण दयाल बाबू पिता की भूमिका में स्वयं उपस्थित है ?
इस संग्रह में एक कहानी है ‘पहिल रोपना’। आज के ज्यादातर कथाकार शहरी मध्य-वर्ग के जीवन को अपनी कहानी में चित्रित करते हैं। भोजपुर के दो कथाकारों मधुकर सिंह एवं मिथिलेश्वर की कहानियों में देहात है, लेकिन कृष्ण दयाल सिंह की ‘पहिल रोपना’ कहानी में भूमिहीन किसान बनिहार लखुआ, उसकी पत्नी बुधिया उसके छोटे पुत्र बिहारी की गरीबी, ईमानदारी एक नैसर्गिक स्नेह का जो वर्णन है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। सूर्योदय के पहले से लेकर रात गये तक लखुआ दौड़ता है, हाँफता है। उसकी पत्नी बुधिया रोपनी करती है। पर खाने में उसे रोटी नमक और दो बूँद सरसों तेल मिलता है। पुरोहित पंडित सगुन निकालता है, मुफ्त का लखुआ से अपनी खाट ओरचवाता है, और सम्पन्न किसान किशोर उसे मलपुआ खिलाता है। बड़ा किसान किशोर खुद कुछ नहीं करता। उसकी पत्नी कामिनी दिन में उसके लिए श्रृंगार करती है, जब बुधिया पानी डूबे खेत में रोपनी करती है। भूमिहीन किसान एवं सम्पत्र जमींदार के अन्तर्विरोध को जिस प्रकार कहानी में उकेरा गया है, बहुत से प्रतिबद्ध कथाकार भी इसे पकड़ने में असमर्थ रहते हैं और अपनी विद्वता के बल पर काल्पनिक संघर्ष खड़ा करते है। इसी दृष्टि सम्पन्नता से कृष्ण दयाल बाबू को और कहानियाँ लिखनी चाहिए ।
संग्रह में पांचवी रचना ‘थैला-पैसा द्वंद’ एक काव्य एकांकी है। पैसा और थैला, पूँजी और गरीबी के प्रतीक हैं। दोनों एक दूसरे की नुक्ताचीनी करते हैं और अंत में दोनों एक दूसरे की जरूरत महसूस करते हुए एक दूसरे का जय जयकार बोलने लगते हैं। यह अच्छी हास्य-व्यंग्य कविता है। गरीब के लिए पूँजी अपरिहार्य है, तो पूंजी भी गरीब के श्रम के बिना अनुत्पादक है। दोनों में अन्योन्याश्रय संबंध है।

जितेन्द्र कुमार

मदन जी का हाता

आरा ८०२ ३०१

डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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