
सीता : नारी की प्रेरणा व सम्बल
आज सीता हर जगह पूजी जाती है
राम से भी पहले लेते हैं उसका नाम
पर तब भी क्या ऐसा होता
जब वह अपने निष्कासन का विरोध करती
अपना आक्रोश जताती,
अधिकारों की माँग करती
हो सकता है मिट्टी में मिल जाना
तब भी उसकी नियति होती
किन्तु
अन्याय के विरोध में स्वर मुखर करने की
आत्मतुष्टि अवश्य होती
परन्तु. ….
मातृत्व के कर्तव्य से
रंच मात्र भी विचलित हुए बिना
राम के आग्रह को ठुकरा कर
धरती की गोद में समाकर
अपने मूक किन्तु प्रखर विरोध से
राम के अन्याय को उजागर करती
” पत्नी है पति की अर्धांगिनी, अनुगामिनि
पर आत्म सम्मान की बलि स्वीकार्य नहीं “
इस सत्य का बोध कराती
नारी के सम्मान की जोत जगाती
उसकी प्रेरणा व सम्बल बनती रही है सीता
बनती रहेगी
पूजी जाती है पूजी जाती रहेगी सीता।
