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शब्दों से मानसिक पटल पर बाल्यपन की मुस्कान बिखेरती कवियत्री पुष्पा निर्मल की रचना “बचपन के दिन”

RKTV NEWS/अनिल सिंह,26 अप्रैल।आम का महत्व तो वैसे मानव जीवन में स्वास्थ्य और आयुर्वेद के ख्याल से काफी महत्वपूर्ण और प्राचीन है।आम शब्द के उच्चारण मात्र से ही मस्तिष्क में बाल्यपन की स्मृतियां प्रदर्शित होने लगती है और मन प्रसन्नचित हो जाता है।इसी स्मृति और मनुष्य के अनमोल बाल्यपन की स्मृतियों को अपने शब्दों से अंकुरित करती कवियत्री पुष्पा निर्मल की आम और बाल स्मृतियों पर आधारित रचना बचपन के दिन।

बचपन के दिन
जब हम जाते थे पाठशाला रोज।
राह में पड़ता आंटी का घर करते मौज।
उनका आम का पेड़,
कच्ची कैरी देख मुंह में पानी आता।
सभी सहेलियां कहती आहा,
आम चलो तोड़ कर खाया जाता।
मुझे समझ में नहीं आता,
तोड़े कैसे कच्ची कैरी।
मैं बात में उलझाती,
तभी तोड़ती वें सब कैरी।
आंटी से हीं छीलवा कर लाते।
छील देती तो नमक उनसे लाते।
चटकारे ले ले कर कैरी खाते।
वाह क्या दिन थे बचपन के,
कच्ची कैरी का मजा ही कुछ और हुआ करता था।
बचपन में तो मुंह में पानी आ ही जाता।
आज खट्टे के नाम से, मन सिहर जाता।
अमिया से अचार चटनी अमचूर,
लूं लगने पर आम पानी पिलाना चाहिए।
हाथ पांव में मल, सर पर ठंढ़ी पट्टी चाहिए…..पुष्पा निर्मल

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