RKTV NEWS/शालिनी ओझा,22 अप्रैल। जिस धरा पर हमारे जीवन स्थापित है उसके प्रति भी हमारी जिम्मेवारी स्वतः की निरोगी जीवन यापन हेतु है और हमें इसके बिगड़ रहे संतुलन पर अपना ध्यान आकृष्ट करना होगा वरन इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते की इसका विकराल रूप कितना विनाशकारी होगा।आज पृथ्वी दिवस पर प्रस्तुत है मेरी रचना संकल्प ।
संकल्प।
है अद्भुत संयोग ये
दिवस पृथ्वी का भी है
अक्षय तृतीया के शुभ
इस पावन अवसर पे।
करना होगा संकल्प हमें अब
वरना देर बहुत हो जाएगी
जितनी दुर्दशा हो रही अवनि की
कब तक सहेगी अंततः फट ही जाएगी।
अंधाधुंध दोहन नीर का हो रहा
कल कारखाने विषाक्त उगल रहे
कल कल करती निर्मल तरंगिनी में
अशुद्धता का माहुर घोल रहे।
मनन चिंतन की शक्ति
सौगात मिली प्रकृति से इंसान को
पर क्या कभी सोचा हमने
अचला से जितना ले रहे
क्या थोड़ा भी उसे हम दे रहे।
हरियाली है वस्त्र धरा की
चीर हरण हम कर रहे
हरे भरे वन वृक्ष सभी
काट इसे हम नंगा कर रहे।
प्रकृति हमसे रूठ गई है
पर्यावरण लाचार है
पशु-पक्षी मानव सब का
हाल हुआ बेहाल है।
सुनी पड़ी है वादियां
उड़ रही धूल भरी आंधियां
ग्लेशियर भी पिघल रहे
सुख गए ताल ,पोखर बावड़ियां।
हम कागज पर ही केवल
पृथ्वी दिवस मनाते हैं
सच बतलाना इस दिवस पर
काम कितनों ने साधे हैं।
नाराज हुई है कुदरत अब
हम चलो उसे मनाते हैं
अक्षय तृतीया के अवसर पर
अक्षय रखेंगे हम इसे मिलकर सौगंध खाते हैं।
हर इंसान अपने जीवन में
एक दो विटप गर लगा दे
एक अगम सौ पुत्र समान
वृक्षारोपण हो तो धरा भी करे गुमान।

