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बिहार:भोजपुर:प्रकृति संरक्षण का सुंदर उदाहरण है महापर्व छठ : शशि मिश्र

आरा/भोजपुर ( डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)07 नवंबर। वर्तमान परिदृश्य में जहां पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता है, छठ पूजा हमें सिखाती है कि धार्मिक प्रथाओं के साथ पर्यावरण को कैसे संतुलित किया जाए। प्रकृति संरक्षण का संदेश बिहार और अन्य जगहों पर जनता के बीच छठ के माध्यम से सबसे बेहतर तरीके से फैलता है। उक्त बातें सामाजिक कार्यकर्ता शशि मिश्र ने कही।महापर्व छठ की शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए आगे उन्होंने कहा कि छठ पूजा से पर्यावरण संरक्षण, जैविक संरक्षण और प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा मिलता है। घर से लेकर घाट तक जन सरोकार और मेल मिलाप का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। यह त्यौहार सामाजिक सद्भाव और एकजुटता के साथ-साथ वैज्ञानिक महत्व पर भी जोर देता है। छठ व्रत का हर कर्म प्रकृति और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। इस पर्व में नदी, तालाब, पर्यावरण को संरक्षित करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा देता है। छठ महापर्व के अनुष्ठान के दौरान कई अन्य चीजों के उपयोग का विधान है,जिसमें बांस की रिश्वत, मिट्टी का चूल्हा, प्रकृति प्रदत्त फल, ईख शामिल हैं, जो लोगों को प्रेरित करते हैं प्रकृति की ओर लौटें। छठ पर्व पर जल संरक्षण का संदेश भी है। छठ पर्व में अर्घ्य का महत्व सर्वविदित है। यह पर्व पुण्य कर्म की प्रेरणा देता है। विलुप्त होते तालाब, नदियों को जीवन प्रदान करते हैं, जो प्राकृतिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है। महापर्व छठ समावेशी समाज का एक सुंदर उदाहरण भी है। जाति, पंथ और वर्ग से परे, भक्त अर्घ देने के लिए घाट पर खड़े होते हैं । यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि भगवान की नज़र में सभी समान हैं, और इससे भी अधिक सुंदर यह है कि यह संदेश पुराने समय से दिया गया है। इसमें सीधे छठव्रती भगवान सूर्य को जल,दुध,फल, शुद्ध पकवान अर्पित करते हैं,पूजा के लिए सब लोग स्वयं निर्धारित समय पर अर्घ देते हैं। इस पूजा में पहले दिन अस्ताचलगामी भगवान सूर्य और दूसरे दिन उदयीमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इससे भी स्पष्ट है कि भगवान सूर्य जी साक्षात और स्थाई देवता है जिससे प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन होता है।भूमंडल पर जन्म और मृत्यु लगातार चलते रहता है।
यह पूजा पर्यावरण को स्वच्छ रखने पर व्यापक रूप से ध्यान केंद्रित करती है और हमें सिखाती है कि उत्सव मनाने और पूजा करने के लिए पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना ज़रूरी नहीं है।

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