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नयी दौड़ नयी सोच।

रचनाकार:अजय गुप्ता” अज्ञानी “

नयी दौड़ नयी सोच।

करूणा संवेदना का जगह ना हीं।
आत्मा हुआ पठेरा रे।
प़र निकला परिंदे निकले।
माया मोह बस ठगेरा रे।
काहे खोजत प्रेम अजय,
यें जग काँटो का डेरा रे।
फूल खिले ढाई दिन रहें,
पंखुरी दल सब बिखेरा रे।
काम आए कामू टोहे,
निकसे काम कौन संजोया रे।
यह दुनिया फायदा की मारी,
बिन फायदा सब पठेरा रे।
ठग ठगेरा करत रहत,
जग जन सब भयो पुजेरा रे।
मानव हृदय दुखियारा मारा,
मरा हृदय बना पुजेरा रे।
प्रेम पूजा धोखा सब प्यारे,
है जीवन का सब बखेरा रे।
जीवन पंक्षी उड़ चला,
फूका पिंजर कौन पुछेरा रें।
बढ़ता को जग बाढे,
रुका जीवन जस बिषेरा रें।
नयन बरसे देख लाभ हान,
छूछा को कौन पुछेरा रे।
बन लावारिस जग मुआ,
मानुस-मानुस का सब फेरा रें।
बिन फायदा कऊं काम के,
बिन फायदा सब पठेरा रे।
बिन फायदा—–।

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