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भोपाल:सुरेश पटवा की 34 वीं कृति “व्यंग्य-पच्चीसी” का लोकार्पित।

भोपाल/ मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद)15 जून।भोपाल दुष्यंत संग्रहालय में सुरेश पटवा के व्यंग्य संग्रह “व्यंग्य-पच्चीसी” का लोकार्पण मुकेश वर्मा की अध्यक्षता, डॉक्टर संजय सक्सेना के मुख्य आतिथ्य, डॉक्टर मोहन तिवारी आनंद, विवेक रंजन श्रीवास्तव के सारस्वत आतिथ्य में संपन्न हुआ। शारदा दयाल श्रीवास्तव और जयजीत अकलेचा ने कृति का समीक्षात्मक विवेचन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉक्टर आदित्य हरि गुप्ता ने किया।

लेखकीय संबोधन में लेखक सुरेश पटवा ने हरि शंकर परसाई को अपना प्रेरणा स्रोत बताया। जिन्होंने “पश्चिमी सटायर” के साथ भारतीय वांग्यमय साहित्य का विशद अध्ययन किया था। उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि बुंदेलखंड रही, जहाँ रोजमर्रा के जीवन में व्यंग्यात्मक लहजा रसा बसा है। इसीलिए उनके भीतर से व्यंग्य बड़ी सहजता से निकलता था। उन्होंने “व्यंग्य-पच्चीसी” में सम्मिलित व्यंग्यों की रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनकी रचनाओं में व्यंग्य स्वाभाविक रूप से उतरता है। उन्हें कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता।

अध्यक्ष की आसंदी से बोलते हुए मुकेश वर्मा ने कहा कि सुरेश पटवा के स्वभाव में जो खुलापन दीदा-दिलेरी अर्थात कुछ करने का साहस, खुलेआम निर्भीकता, दुस्साहस, धृष्टता के साथ प्रतिरोध की स्वाभाविक प्रवृत्ति की झलक है, उसके चलते उनकी अभिव्यक्ति में एक बेचैनी, छटपटाहट और कश्मकश का भाव प्रबल और प्रखर होकर उस कहन को चुनता है, जिसे व्यंग्य लेखन के लिए माफिक और मुनासिब माना गया है। इसी खासियत से वे एक समर्थ व्यंग्यकार हैं।

मुख्य अतिथि डॉक्टर संजय सक्सेना ने अपने उद्बोधन में कहा कि सुरेश पटवा जी के बारे में कहा जाता है कि वो एक ऐसे लेखक हैं जो मौलिकता के साथ गहरी सामाजिक समझ और मानवीय अनूभूतियों के दर्शन अपने साहित्य में कराते हैं। व्यंग्य पच्चीसी उनकी उसी तरह की एक अनूठी पुस्तक है।

डॉक्टर मोहन तिवारी आनंद बताया कि सुरेश पटवा विविध आयामी लेखक हैं। वे पूरी तैयारी से लेखन करते हैं। उनका बेलौस अंदाज़ और निर्भीकता उनकी व्यंग्य रचनाओं में झलकती है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव ने कहा कि सुरेश पटवा बैंक की नौकरी से रिटायर होकर साहित्य की सक्रिय पारी में क्रीज पर निरंतर खेल रहे हैं। 74 वर्ष की उम्र में विविध विषयों की 34 कृतियों के लिए साहित्य जगत में जाने जाते हैं। पटवा जी के साहित्य में “कलम और कदम” का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है वे मेज पर बैठकर नहीं, मोटर साइकिल से लद्दाख और भूटान की यथार्थ पड़ताल करने के बाद साहित्य रचते हैं।

शारदा दयाल श्रीवास्तव ने समीक्षात्मक विवेचना प्रस्तुत करते हुए बताया कि सुरेश पटवा के व्यंग्य समकालीन विद्रूपताओं पर उत्तम तरीकों से कटाक्ष करते हैं। उनकी अभिव्यक्ति के विलक्षण तरीके इस दौर के व्यंग्यकारों को प्रेरणा प्रदान करते हैं।

जयजीत अकलेचा ने समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कृति को अद्भुद बताया और इसमें शामिल व्यंग्यों को समकालीन विद्रूपताओं पर करारा प्रहार निरूपित किया। उन्होंने श्री पटवा को परसाई परम्परा का व्यंग्यकार बताया।

“व्यंग्य पच्चीसी लोकार्पण अवसर पर ये सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार उत्कृष्ट व्यंग्य किया। अरुण अर्णव खरे “शीर्षक ब्लू व्हेल गेम और किसान”, विजी श्रीवास्तव “कफ़न चाहिए तो बोलो”, मलय जैन शीर्षक है “यूपी वाला ठुमका और ठुस्स कमरिया”, सुदर्शन सोनी “जनरेशन गैप इन कुत्ता पालन”, यशवंत गोरे “सत्ता नारायण कथा – अथ प्रथमोऽध्यायः”, डॉक्टर आदित्य हरि गुप्ता मालवीय व्यंग रचना “तो से नेता बनियों नी जाए”, डॉक्टर अशोक व्यास “आई लव मीडिया”, शिवकुमार दीवान “कल युग में कम नहीं डंठल वाला पान” व्यंग्य प्रस्तुत कर श्रोताओं को गुदगुदाया। व्यंग्य पाठ का बेहतरीन संचालन व्ही के श्रीवास्तव ने किया।

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