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भोपाल:मानव संग्रहालय में 15 दिवसीय प्रोडक्शन ओरिएंटेड कुचिपुड़ी नृत्य कार्यशाला का भव्य समापन।

‘नृत्य साधना’ प्रस्तुति में प्रतिभागियों ने बिखेरा भारतीय शास्त्रीय नृत्य का सौंदर्य।

भोपाल/मध्यप्रदेश( मनोज कुमार प्रसाद)15 जून।इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल द्वारा भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से आयोजित 15 दिवसीय प्रोडक्शन ओरिएंटेड कुचिपुड़ी नृत्य कार्यशाला का 14 जून को भव्य एवं गरिमामय समापन हुआ। कार्यशाला के समापन अवसर पर प्रतिभागियों द्वारा तैयार की गई विशेष प्रस्तुति ‘नृत्य साधना’ का आयोजन संग्रहालय के सभागार में किया गया, जिसने दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की सौंदर्यपूर्ण अभिव्यक्तियों से मंत्रमुग्ध कर दिया।
यह कार्यशाला 1 जून से 15 जून 2026 तक आयोजित की गई थी। कार्यशाला का निर्देशन सुप्रसिद्ध कुचिपुड़ी नृत्यांगना एवं संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित गुरु वनश्री राव ने किया तथा इसमें श्रीवाशिम राजा ने सहयोगी प्रशिक्षक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को कुचिपुड़ी नृत्य की मूलभूत तकनीकों, अंग-संचालन, मुद्राओं, ताल-लय, अभिनय, भावाभिनय तथा मंचीय प्रस्तुति के विभिन्न आयामों का गहन प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
समापन समारोह में प्रस्तुत ‘नृत्य साधना’ कार्यक्रम कार्यशाला के दौरान अर्जित प्रशिक्षण और प्रतिभागियों की मेहनत का सजीव प्रदर्शन था। प्रस्तुति में कुचिपुड़ी शैली की पारंपरिक विशेषताओं का उत्कृष्ट समन्वय देखने को मिला। प्रतिभागियों ने भगवान कृष्ण, भगवान शिव तथा भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं से प्रेरित विविध नृत्य रचनाओं का प्रभावशाली मंचन किया। भाव, राग, ताल और अभिनय के संतुलित संयोजन ने दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की समृद्ध परंपरा से परिचित कराया।
कार्यक्रम में प्रस्तुत समूह एवं एकल नृत्य रचनाओं ने कुचिपुड़ी की विशिष्ट नाट्यधर्मी शैली, अभिव्यक्ति की गहनता तथा सौंदर्यबोध को प्रभावी रूप से उकेरा। प्रतिभागियों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से न केवल तकनीकी दक्षता का प्रदर्शन किया, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना को भी अभिव्यक्त किया। दर्शकों ने प्रस्तुति के प्रत्येक चरण का उत्साहपूर्वक स्वागत करते हुए कलाकारों का तालियों से अभिनंदन किया।
इस अवसर पर संग्रहालय निदेशक प्रो अमिताभ पांडे ने कहा कि भारतीय शास्त्रीय कलाएँ हमारी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार हैं और ऐसी कार्यशालाएँ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बनती हैं। उन्होंने कहा कि संग्रहालय केवल वस्तुओं और परंपराओं के संरक्षण का केंद्र नहीं है, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के संवर्धन का भी महत्वपूर्ण मंच है। इसी उद्देश्य से संग्रहालय समय-समय पर विभिन्न कला, संस्कृति एवं प्रदर्शन कलाओं से संबंधित प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करता रहता है।
अपने संबोधन में गुरु वनश्री राव ने प्रतिभागियों के उत्साह, अनुशासन और समर्पण की सराहना करते हुए कहा कि कुचिपुड़ी केवल एक नृत्य शैली नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। उन्होंने प्रतिभागियों को निरंतर अभ्यास, समर्पण और साधना के माध्यम से इस कला को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने यह भी कहा कि युवा पीढ़ी में भारतीय शास्त्रीय कलाओं के प्रति बढ़ती रुचि भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों को कार्यशाला में सफल सहभागिता के लिए प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। संग्रहालय की ओर से गुरु वनश्री राव, वाशिम राजा, प्रतिभागियों, अभिभावकों तथा कार्यक्रम के सफल आयोजन में सहयोग देने वाले सभी व्यक्तियों का आभार व्यक्त किया गया।
समापन समारोह में बड़ी संख्या में कला प्रेमी, अभिभावक, विद्यार्थी, सांस्कृतिक कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति संग्रहालय की प्रतिबद्धता को पुनः रेखांकित किया और उपस्थित दर्शकों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत की जीवंत अनुभूति प्रदान की।
संग्रहालय के जन संपर्क अधिकारी हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने बताया कि,इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय लंबे समय से देश की विविध लोक, जनजातीय एवं शास्त्रीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और प्रसार के लिए कार्यरत है। इसी श्रृंखला में आयोजित यह कार्यशाला और उसकी समापन प्रस्तुति भारतीय कला-संस्कृति के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
कार्यशाला का समन्वयन आयशा गराबडू, संग्रहालय सहायक , द्वारा तथा सह-समन्वयन सुश्री सुकन्या गुहा नियोगी, संग्रहालय सहायक ,द्वारा किया जा रहा है

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