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राजशाही गई, नेताशाही आई: लोकतंत्र में परिवारों की नई सल्तनत!

सुमित कुमार मिश्र
सत्ता जनता के नाम पर, राजनीतिक विरासत परिवारों के नाम पर और संघर्ष करने वाला कार्यकर्ता आखिर किसके नाम पर राजनीति करे?

RKTV NEWS/सुमित कुमार मिश्र,01 नवंबर।भारत ने 1947 में अंग्रेजी शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में अपनी यात्रा शुरू की। स्वतंत्रता के समय देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी सैकड़ों देशी रियासतों का एकीकरण। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, राजनीतिक कौशल और दूरदर्शिता से 565 से अधिक रियासतों के एकीकरण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उद्देश्य स्पष्ट था—राजाओं और नवाबों की अलग-अलग सत्ताओं से आगे बढ़कर एक मजबूत, एकीकृत और लोकतांत्रिक भारत का निर्माण। लेकिन आज भारतीय राजनीति को देखकर एक असहज सवाल उठता है कि क्या राजशाही वास्तव में समाप्त हुई या उसने नेताशाही और परिवारशाही का नया रूप धारण कर लिया?

इतिहास के पन्ने पलटिए। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक और छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे महान शासकों ने अपने-अपने कालखंड में शासन किया। उनके बाद सत्ता की बागडोर अगली पीढ़ी तक पहुंची। असम के अहोम शासकों सहित भारत के अनेक राजवंशों में भी उत्तराधिकार की परंपरा रही। यह राजतंत्र की व्यवस्था थी, जहां सत्ता का हस्तांतरण वंश और उत्तराधिकार के आधार पर होता था। आज का भारत उस व्यवस्था से बाहर निकलकर लोकतंत्र अपना चुका है। लेकिन विडंबना देखिए कि सत्ता के हस्तांतरण का पारिवारिक स्वरूप राजनीति के कई क्षेत्रों में अब भी दिखाई देता है।

लोकतंत्र में 989 राजनीतिक परिवारों का प्रभाव!

राजनीति में परिवारवाद पर चर्चा अक्सर आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाती है। लेकिन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की सितंबर 2025 की रिपोर्ट और इंडियन एक्सप्रेस की अक्टूबर 2025 की पड़ताल इस बहस को आंकड़ों के आधार पर सामने रखती है।

इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के अनुसार, देश के 5,294 सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों में 989 राजनीतिक परिवारों के 1,174 सदस्य ऐसे थे, जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि पारिवारिक विरासत से जुड़ी थी। दूसरी ओर, ADR के अध्ययन में 5,203 जनप्रतिनिधियों में 1,106 यानी लगभग 21 प्रतिशत के राजनीतिक पारिवारिक संबंध पाए गए।

ये आंकड़े भारतीय लोकतंत्र के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करते हैं। क्या राजनीति में प्रवेश का रास्ता आम नागरिक के लिए भी उतना ही सहज है, जितना किसी स्थापित राजनीतिक परिवार के सदस्य के लिए?

राजनीति में विरासत या योग्यता?

आज कोई नेता चार-पांच बार सांसद या विधायक बनता है। दो दशक से अधिक समय तक राजनीति में सक्रिय रहता है। उसके बाद बेटे, बेटी, पत्नी या परिवार के किसी अन्य सदस्य को राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाया जाता है। कई बार उसी परिवार की अगली पीढ़ी भी चुनाव लड़ती है और सत्ता में पहुंच जाती है।

सवाल यह नहीं कि किसी नेता के परिवार का सदस्य राजनीति में क्यों आए, क्योंकि संविधान हर नागरिक को चुनाव लड़ने का अधिकार देता है। असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दलों में आम कार्यकर्ता और नई पीढ़ी के नेतृत्व को भी उतना ही अवसर मिल रहा है?

क्या लोकतंत्र में नेतृत्व की योग्यता का आधार जनसेवा है या राजनीतिक परिवार में जन्म लेना?

भारतीय लोकतंत्र में बार-बार चुनाव जीतना किसी जनप्रतिनिधि का अधिकार है। जनता यदि किसी व्यक्ति को लगातार चुनती है तो उसके निर्णय का सम्मान होना चाहिए। लेकिन जब राजनीति में कुछ परिवारों का प्रभाव पीढ़ियों तक बना रहता है और संगठन के भीतर संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता को नेतृत्व का अवसर नहीं मिलता, तब लोकतंत्र की वास्तविक भावना पर बहस जरूरी हो जाती है।

कार्यकर्ता झंडा उठाने के लिए या नेतृत्व करने के लिए?

राजनीतिक दलों में एक सामान्य कार्यकर्ता वर्षों तक बूथ पर काम करता है। चुनाव के समय घर-घर जाता है, पोस्टर लगाता है, सभाओं में भीड़ जुटाता है और संगठन के लिए अपना समय तथा संसाधन लगाता है। उसे उम्मीद रहती है कि एक दिन उसकी मेहनत और समर्पण की पहचान होगी। लेकिन कई बार टिकट वितरण और नेतृत्व चयन के समय पारिवारिक प्रभाव, राजनीतिक पहचान और विरासत निर्णायक दिखाई देते हैं।

तब कार्यकर्ता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या मेरी भूमिका केवल झंडा उठाने, नारे लगाने और चुनाव जिताने तक ही सीमित है?

राजनीतिक दलों को समझना होगा कि कार्यकर्ता केवल चुनावी मशीन का पुर्जा नहीं होता। वही संगठन की वास्तविक ताकत है। यदि नेतृत्व के दरवाजे कुछ परिवारों तक सीमित होते चले गए तो नई प्रतिभाओं के लिए राजनीति में आने का आकर्षण कम होगा। लोकतंत्र में अवसरों का विस्तार होना चाहिए, संकुचन नहीं।

राजनीतिक दल या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी?

राजनीतिक दलों के कामकाज पर कभी-कभी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जैसा कटाक्ष किया जाता है। इस कटाक्ष का आधार यही धारणा है कि संगठन में पद और राजनीतिक अवसर कुछ प्रभावशाली परिवारों के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं। कहीं राष्ट्रीय नेतृत्व में परिवार का प्रभाव है तो कहीं राज्यों और स्थानीय राजनीति में राजनीतिक विरासत का दबदबा दिखाई देता है।

इससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि क्या राजनीतिक दल वास्तव में आंतरिक लोकतंत्र का पालन कर रहे हैं? क्या संगठन में काम करने वाले सामान्य कार्यकर्ता के लिए शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने का कोई पारदर्शी रास्ता है?

परिवारवाद के विरोध में किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों को सीमित करना समाधान नहीं हो सकता। किसी नेता का पुत्र या पुत्री चुनाव लड़े, यह अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन उसे भी अपनी योग्यता, जनसेवा और जनता के विश्वास के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। राजनीतिक दलों में पारदर्शी टिकट वितरण, संगठनात्मक चुनाव, नए कार्यकर्ताओं को अवसर और नेतृत्व में पीढ़ीगत भागीदारी सुनिश्चित करने की व्यवस्था विकसित होनी चाहिए।

सरदार पटेल का एक भारत और आज की राजनीतिक चुनौती

सरदार पटेल की जयंती पर राष्ट्रीय एकता के नारे लगाने के साथ हमें राजनीतिक एकाधिकार और अवसरों के केंद्रीकरण पर भी विचार करना चाहिए। उन्होंने रियासतों के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज उनकी विरासत से प्रेरणा लेने का अर्थ है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को इतना मजबूत बनाया जाए कि सत्ता किसी व्यक्ति या परिवार की स्थायी विरासत न बन सके।

आखिर भारत ने राजाओं की रियासतों से निकलकर लोकतंत्र इसलिए नहीं अपनाया था कि कुछ दशक बाद राजनीतिक रियासतों का नया स्वरूप खड़ा हो जाए। लोकतंत्र का अर्थ केवल पांच साल में मतदान करना नहीं, बल्कि हर योग्य नागरिक के लिए नेतृत्व तक पहुंचने का अवसर उपलब्ध होना भी है।

राजा का बेटा राजा बनता था, यह राजशाही थी। नेता का बेटा नेता बने, यह उसका अधिकार है; लेकिन यदि आम कार्यकर्ता के लिए नेतृत्व के दरवाजे बंद होने लगें, तो यह लोकतंत्र के सामने गंभीर चुनौती है।

भारत को ऐसी राजनीति चाहिए जिसमें अनुभव का सम्मान हो, लेकिन विरासत को योग्यता का विकल्प न बनाया जाए। संसद किसी परिवार की जागीर नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान है। जनप्रतिनिधि जनता के सेवक हैं, सत्ता के स्थायी स्वामी नहीं।

राजशाही का अंत केवल राजाओं की गद्दी समाप्त होने से नहीं होगा, बल्कि तब होगा जब राजनीति में परिवार से ऊपर योग्यता, विरासत से ऊपर जनसेवा और सत्ता से ऊपर संविधान को स्थान मिलेगा।

यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।

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