जयंती पर श्रद्धापूर्वक स्मरण किए गए सम्मेलन के पूर्व सभापति और धर्मेंद्र ब्रह्मचारी शास्त्री, हुई लघुकथा-गोष्ठी।
RKTV NEWS)पटना(बिहार)27 सितम्बर। बनैली के राजा बहादुर कीर्त्यानंद सिंह कला,संगीत और साहित्य के महान पोषक और स्वयं एक समर्थ कवि थे। अपने दरबार में आहूत कवि-सम्मेलनों में एक-एक कविता पर एक स्वर्ण अशर्फ़ी कवि को दे दिया करते थे। वर्ष १९३६ में साहित्य सम्मेलन के भवन-निर्माण हेतु दस हज़ार रूपए की एकमुश्त राशि प्रदान की थी। तब राज्य सरकार की ओर से २७०० रूपए की सहायता प्राप्त हुई थी। तब यह देश स्वतंत्र भी नहीं हुआ था और एक तोले के स्वर्ण-आभूषण का मूल्य ४७ रूपए हुआ करता था। उनके कार्य-काल में बनैली-राज की कीर्ति दूर-दूर फैली हुई थी। आज उनके जैसे उदार दानियों और संस्कृति-संरक्षकों का अकाल पड़ गया है। यही कारण है कि, आज ये सारस्वत प्रवृतियाँ समाज में हासिए पर चली जा रही हैं।
यह बातें रविवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने संत-साहित्य के महान अनुशीलन-कर्त्ता और साहित्यकार डा धर्मेंद्र ब्रह्मचारी शास्त्री को भी जयंती पर श्रद्धा-पूर्वक स्मरण किया और कहा कि शास्त्री जी संत-साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य थे । प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियों पर किए गए उनके कार्य, साहित्य-संसार की धरोहर हैं। उनका संपूर्ण जीवन तपश्चर्या का पर्याय था। राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा प्रकाशित, संत-साहित्य की उनकी शोध-पुस्तक विश्व के ३० बड़े विश्वविद्यालयों में उपलब्ध है, जिनके पुस्तकालयों में उसका उपयोग शोधार्थियों द्वारा संदर्भ-ग्रंथ के रूप में किया जा रहा है।
जयंती समारोह का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। इस अवसर पर आयोजित लघुकथा-गोष्ठी में डा पुष्पा जमुआर ने ‘आईना’, डा विद्या चौधरी ने ‘गुरु-मंत्र’, ईं अशोक कुमार ने ‘आफ़त में रिश्ते’, सदानन्द प्रसाद ने ‘गहरी चोट’, निर्मला सिंह ने ‘मानवता’, इन्दु भूषण सहाय ने ‘दिखावा’, सावित्री पाण्डेय ने ‘चीकू-नीकू’, अभिराम बुद्धवाहा ने ‘किलकारी’ , डा कुन्दन लोहानी ने ‘सबक़’ तथा प्रवीर कुमार पंकज ने ‘उम्मीद’ शीर्षक से अपनी-अपनी लघुकथा का पाठ किया। अतिथियों का स्वागत सम्मेलन के पुस्तकालयमंत्री डा नागेश्वर प्रसाद यादव ने तथा मंच का संचालन डा मनोज गोवर्धनपुरी ने किया।

