भारत भवन में दो दिवसीय भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान का शुभारंभ, 19 पुस्तकों का लोकार्पण।
भोपाल/मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद) 15 सितंबर। मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भाव, विचार, संस्कार और संस्कृति की अभिव्यक्ति है। अपनी भाषा और जड़ों से जुड़कर ही युवा सशक्त राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह बात सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने सोमवार को भारत भवन में दो दिवसीय ‘भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान’ के शुभारंभ अवसर पर कही।
वीर भारत न्यास एवं संस्कृति संचालनालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 19 पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। सारंग ने कहा कि किसी भी समाज और संस्कृति की मूल पहचान उसकी मातृभाषा में निहित होती है। भाषा व्यक्ति को अपनी परंपरा, ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृभाषा आधारित शिक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। मध्यप्रदेश में हिंदी माध्यम से एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू किया जाना भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने युवाओं से अपनी भाषा, बोली और संस्कृति को आत्मसात कर वर्ष 2047 तक विकसित और सशक्त भारत के निर्माण का संकल्प लेने का आह्वान किया।
भारतीय भाषाओं में सुरक्षित हैं सभ्यता और संस्कृति की स्मृतियां
अपर मुख्य सचिव संस्कृति शिवशेखर शुक्ला ने कहा कि गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर भारतीय भाषाओं, साहित्य और ज्ञान परंपरा के इस अनुष्ठान का शुभारंभ होना मंगलकारी संयोग है। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता और संस्कृति की स्मृतियां हमारी मातृभाषाओं, बोलियों और लिपियों में सुरक्षित हैं। यह आयोजन भारतीय भाषाओं की विविधता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय एकता की भावना को अभिव्यक्त करने का महत्वपूर्ण प्रयास है।
19 महत्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण
समारोह में भारतीय ज्ञान, साहित्य और संस्कृति से जुड़ी 19 पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। इनमें वीर भारत न्यास की भारत निधि श्रृंखला के अंतर्गत महर्षि पाणिनि, भोजदेव, महर्षि पतंजलि, भर्तृहरि और सम्राट राजेंद्र चोल पर केंद्रित कृतियां शामिल हैं। इसके अलावा ‘अष्टावक्रगीता’, ‘नारदगीता’, ‘गर्भगीता’, ‘ब्राह्मणगीता’, ‘उत्तरगीता’, ‘परमहंसगीता’, ‘वृत्रगीता’, ‘हंसगीता’, ‘चंद्रगीता’ और ‘जानकीगीता’ सहित दस गीताओं का लोकार्पण हुआ। ‘युग-युगीन जल’, ‘उड़ चल अपने देश’, ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला—हिंदी साहित्य के प्रकाश पुंज’ तथा मध्यकालीन मध्य भारत के नगर, बस्तियां, मंदिर और तालाब पर आधारित कृतियां भी जारी की गईं।
भाषाओं में भारत की आत्मा को समझने का विमर्श
अनुष्ठान में ‘मातृभाषा से राष्ट्रभाषा : भाषाओं में भारत की आत्मा’ विषय पर विमर्श हुआ। बांग्ला के स्नेहाशीष सूर और कश्मीरी के आसिम मोहिउद्दीन ने विचार व्यक्त किए। सत्र का समन्वय माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने किया। भाषाई पत्रकारिता पर आयोजित दूसरे सत्र में जयदीप कर्णिक, गिरीश उपाध्याय और नारायण व्यास ने विचार साझा किए।
कवि सम्मेलन और चित्रित पांडुलिपियों ने बांधा समां
राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में डॉ. कीर्ति काले, स्वयं श्रीवास्तव, दिनेश दिग्गज, शैलेन्द्र मधुर, अज़हर इकबाल और रामायणधर द्विवेदी ने काव्य पाठ किया। वहीं ‘शब्द से चित्र तक’ प्रदर्शनी में भारतीय भाषाओं के साथ तिब्बत, नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशिया की चित्रित पांडुलिपि परंपराओं को प्रदर्शित किया गया।
कार्यक्रम के पूर्वरंग में उमेश तरकसवार एवं दल ने भारतीय भाषाओं और विभिन्न लोकबोलियों के गीत प्रस्तुत किए। विविध भाषाओं के सुरों ने भारत की भाषाई विविधता में निहित सांस्कृतिक एकता का मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में संस्कृति संचालनालय के संचालक एन.पी. नामदेव, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी, दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश मिश्रा सहित भारत भवन, मातृभाषा मंच और अन्य सहभागी संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

