द्विवेदी और आरसी भी किए गए स्मरण, पुस्तक ‘ऐ मेरे वतन के लोगों का हुआ लोकार्पण, हुई कवि-गोष्ठी।
RKTV NEWS/पटना(बिहार)19 अगस्त। साहित्य सम्मेलन के ऊपरी तल पर स्थित संत-शिरोमणि महाकवि गोस्वामी तुलसी दास की भव्य प्रतिमा पर माल्यार्पण और पूजन के साथ तुलसी जयन्ती मनायी गयी।
श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि तुलसी दास एक भक्त कवि ही नहीं, साहित्य की भाव-संपदा से संपन्न एक ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने काव्य-साहित्य को हिमालय की ऊँचाई दी है।’रामचरित मानस’ तो उनकी अमर कृति ही है, जिसने भारतीय समाज को आत्म-गौरव से भरकर नवजीवन प्रदान की, बल्कि उनकी अन्य कृतियाँ ‘विनय-पत्रिका’, ‘कवितावली’, ‘दोहावली’, ‘गीतावली’, ‘बरवै रामायण’, ‘पार्वती मंगल’, ‘जानकी मंगल’ आदि भी लालित्यपूर्ण साहित्य की सुंदरम उदाहरण हैं। वे सही अर्थों में लोक-नायक हैं और उनकी कृतियाँ ‘साहित्य’ को अर्थ प्रदान करती हैं।
यह बातें बुधवार को साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती-समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। जयंती पर हज़ारी प्रसाद द्विवेदी और महाकवि आरसी प्रसाद सिंह को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत, हिन्दी, बांगला और अंग्रेज़ी भाषाओं के अधिकारी विद्वान और ‘पद्मभूषण’ अलंकरण से विभूषित आचार्य द्विवेदी जी एक महान समालोचक, निबन्धकार और उपन्यासकार थे। हिन्दी-साहित्य के एक मुक्त विश्वविद्यालय ही थे द्विवेदी जी, जिनका सान्निध्य पाकर अनेक नवोदित साहित्यकार हिन्दी-व्योम के देदीप्यमान नक्षत्र बन गए। वहीं दूसरी ओर, प्रकृति, प्रेम, जीवन और यौवन के महाकवि थे आरसी प्रसाद सिंह। मैथिली और हिन्दी में समान अधिकार से लिखने वाले आरसी बाबू बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों, दिनकर, प्रभात, वियोगी, नेपाली और जानकी बल्लभ शास्त्री के साथ परिगणित होते हैं । वे भारत के उस शाश्वत जीवन-दर्शन का चित्रण प्रस्तुत करते हैं, जिसमें जीवन के प्रति एक रागात्मक वितराग है – “जीवन क्या है? निर्झर है/ मस्ती ही इसका पानी है/ सुख-दुःख के दोनों तीरों से / चल रहा राह मनमानी है”।
इस अवसर पर समारोह के मुख्य अतिथि और पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्त्ति मान्धाता सिंह ने लखीसराय के वयोवृद्ध किसान-कवि देवेन्द्र सिंह आज़ाद के ग़ज़ल-संग्रह ‘ऐ मेरे वतन के लोगों का लोकार्पण किया। अपने उद्गार में उन्होंने कहा कि गोस्वामी जी मेरे आदर्श और मनोआचार्य हैं। मेरे जीवनादर्श पर उनका गहरा प्रभाव है। यह मेरे लिए सौभाग्य का विषय है कि हज़ारी प्रसाद जी हमारे जवारी थे। उनका पैतृक गाँव हमारे गाँव से बस कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही है। उनके पुत्रों सत्य प्रकाश और ज्ञान प्रकाश से मेरे गहरे संबंध रहे।
इस अवसर पर आयोजित कवि-गोष्ठी का आरंभ चंदा मिश्र ने वाणी-वंदना से किया। लोकार्पित ओऊस्तक के कवि देवेंद्र सिंह आज़ाद, डा रत्नेश्वर सिंह, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, दा राम कुमार झा ‘निकुंज’, कुमार अनुपम, सदानन्द प्रसाद, विभारानी श्रीवास्तव, शमा कौसर ‘शमा’, इरफ़ान अहमद बेलहारी, जय प्रकाश पुजारी, इन्दु भूषण सहाय, आदित्य कुमार, नन्दन कुमार, आदि कवियों ने अपनी रचनाओं से तीनों विभूतियों को काव्यांजलि अर्पित की। मंच का संचालन कवि ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
इस अवसर पर, व्यंग्यकार ईं बाँके बिहारी साव, कवयित्री डा शालिनी पाण्डेय, प्रवीर कुमार पंकज, डा इन्दु पाण्डेय, निर्मला सिंह, अभय दत्त आर्य, अश्विनी कविराज, समीर कुमार मिश्र, विजय कुमार सिन्हा, सच्चिदानन्द शर्मा, रंजन कुमार अमृतनिधि, सत्यम भारद्वाज, भानु भैरव, विकास कुमार, आदि प्रबुद्धजन उपस्थित थे।


