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गवाही गुम्बद के

गवाही गुम्बद के

जब पढ़े जात रहीं, राह में भेंटात रहे, गाँछी पर के आम टपकल, जब तब भेंटात रहे।

राम भरोसा बाबा के प्रसाद, मीठ लागत रहे,
रहमतुल्हा चाचा के मलीदा मीठ लागत रहे।

आम मीठ लागते रहे, अब काहे तीत लागे,
काहे आम फल काहे अब नीम अइसन तीत लागे।

काँच-काँच आम, कोठील दाँत करत रहे,
ऊहो अब मुँहवा के, काहे तीत करत बा।

ई ना हउवे नीम गाँछ, अमवे हउवे दोस्त,
ई गाँछ त उहे हउवे, जे देखले रहऽ दोस्त।

तब मीठा में तीता बा कइसे घोरल गइल ?
अब फलवो छोट-छोट कइसे वा हो गइल ?
लागत बा नजरिये बदलल बदलल बा,
दोष अब नजरिये में कुछ-कुछ घूसल बा।

दोष आँखे के कइसे मानी,का चखल स्वादो बा झूठ,
पेट भरू जब तनिको ठूंसिहन मीठको लागी कडआ, ना बा झूठ।

तब अइसन में का जलेबी परत में, मिर्चा बीआ खोजल जाई,
आम गाँछ काट, का जड़ खोद के बीआ खोजल-परखल जाईं,
भल होई, डंठल से, पतई से, फुनुंगी से पहचानीं,
कुछ अउर गवाही चाहीं त भौरन से पूछल चाहीं।

हरिअर सुग्गा काली कोयल से पूछल चाहीं,
कौवा बाड़न खाइले उनका से पूछल चाहीं।

गाँछ काट के ढाहल, जड़ खोद बीआ खोजल गलत,
भव्य भवन के जईसन होवे गुम्बद, साँच ना होई,त का होई गलत।

रचनाकार: डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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