जबाबदेही
अइसन बिपतिया के केकर जिम्मेवारी रहे,
वीर तनि खोल के बतावऽ साँच बतिया;
केकरा पर दोष आज मढ़ी हम बोलऽ ना,
जवना से रोज काटल जात बडुवे मुड़िया।
अजब बा सवाल अनसुलझल तोहार इहो,
कइसे में परत उघारी अब आज इहो।
गिनल चुनल दस-बीस रहितन हतेयारवा त,
लेके आजुवो; भठीहारा इँहा, मुड़काटवा हो।
पारा-पारी नामवा गिनइती लेके आजुवो
डेगे-डेगे खाड़ बाड़न पापी भट्ठीहारा ईहां,
घातवा लगइले बाड़न सगरो मुड़ीकटवा हो।
मारे अइसन मार नाहिं पानीयो घोंटाय पावे,
उहे आज देवता के रूपवा बनइले बा;
शातीर अपराधी हउवे, ना योगी ना फकीर हउवे,
झुठहूँ के तुलसी के माला खटखटावत बाड़न।
कइसन : अन्हरचटकी में जग के फंसवले बाड़न।
गद्दी हृथिआवे खातिर गलत पोथी-पतरा के गढ़ले बाड़न।
एकहू ना लूर नीमन पापी के गिनावे लायक,
कहे कुल वंश गोत्र अच्छा होला सबहू से।
इहे पाठ गढ़ी-गढ़ी सबके के पढ़ावतो बाड़न,
देबे नाहिं पढ़े छूटा ओइसन कथा गढ़ले बाड़न।
सर्व शिक्षा के सूघनी सूंघे ना देलन,
शिक्षा के दरवाजा तक दोसरा के पहुँचे ना देलन।
इहे बाड़न गुनहगार अबहू से चिन्हीं जा,
इहे छछना के जान मरले बाड़न चिन्हीं जा।
कतना बडुवे ई बात साँच, नीमन से जानत बाड़न,
मालूम ना काहे सँचका बात पर मुँह सिअले बाड़नः
का मालूम कवनो लोभ लालच के फेरवट होखे इनको,
ओही से आपन मुँह पर जाब लगवले बाड़ना।
देखे दुनिया दयानन्द के कहस सभे पढ़े वेद, भेद झूठ बा,
एह कपटी, छलबाज, ताज-महन्थी पर थूकऽ,
गूँगा बन घंटी दावे में कई बाँस आगे बाड़न,
आवऽ सब मिल अइसन करम पर थूकऽ।
ई चाहेला चोरन के, ठगवन के ललकारे ला,
इनके छतर-छाँह में पाप फूलेला-फरेला;
इहे छल प्रपंच के बेना हाँकेला,
खुशामदी लोगन से मोटरी ढोववावेला ।
हम मरनी भा मरत बानी इनके पापे,
हारल बा हिन्द घर में इनके पापे।
आपन दुखवा के कतना कारण गिनवाई,
कवन-कवन ना घंटी दबलख, केकर नाम गिनवाईं,
बड़-बड़ पाप के ईहे लत लगववले बा,
अइसन बनवल ई देश,आइल जोश के कहे गलत बा।
जेकरा टीक मुकुट पहनवलीं शांति सोच में डूबल बा,
धरती के मारत लात कवि-कोविद आकाश उड़ल बा।
बलिदान के हवन हिन्द में होते नइखे तनिको,
झूठ लवार कपटी ढ़ोंगी जलिहन से चल कहऽ,
देहचोर निकम्मा काहिल हड़तालीन से कहऽ
ई अवसर माँगे के ना बा सीधे काम पर लागऽ,
हम सीमा पर खून, तू खेत-खलिहान, कारखाना, कार्यालय में,
मिहनत के पसीना टपकावऽ हथियार बनावऽ।
जीत के हार हमहीं पहनाइब, पीछा से बल भरले रहीहऽ,
मथुरा के शर्मा आचार्य कहस, गोत्र-वंश ह जन्मना, कथा झूठ बा। बानी इनके पापे, । , खउलत बल बुझ गइल अब ना बाँचल बा तनिको।
हाथे हथियार बढ़ावत रहीहऽ, नीयत इरादा पक्का रखीहऽ।
जब संउसे देश के लोगन के लड़ी जूझे में लागल रही,
कवन माई के लाल आँख देखलाई, रन में ना पछड़ाई।
होवे ना पावे कहँवो अन्याय, लगाम तनि देले रहीहऽ,
लड़त रहबऽ सीमा पर जब तक, आंतरिक सुरक्षा बनवले रहीहऽ धनीक लोग मत रउँदस गरीब के,
ना गरीब के बिटिया से हवस बुतावस।
ना देवदासी बना बना मंदिर में नाच नचावस,
एक बराबर सबके जानस आपस में समता फैलावस।
मत काटस अंगूठा चेला के कवनो गुरु,
जाति-गोत्र बुझ मंत्र पढ़ावल मत करस शुरू।
दंगा-फसाद ना होवे पावे, फिरका परस्ती ना बढ़े पावे,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, बौद्ध, जैन सब भाई अस गले लगावे।
उलटा खोपड़ी वाला अगर कतहूँ आपन सिर उठावस,
तोप अंजोर के यदि अन्हरिया बढ़ल,
कड़क डाँट उनको के दीहऽ, सूरजो-चाँद जब पाप पर उतरस।
यदि नीक भइल ना शासन, भइल जबून, रहल आग सुलगून,
तोप अंजोर के यदि अंधेरिया बढ़ल,
तेज पुरुषन के सुलझल राह कहीं खड़-बड़ मिलल।
कहे के पड़ी दुश्मन ना, ईहे अन्याय हमरा के मारी,
देश दोसरा से ना, आपन घर के लच्छन से हारी।


