
पीछा निरेखल(परशुराम के प्रतिक्षा)
आपन कपारे केकर पाप ढोवत बाड़ऽ
खून देके केकर कलंक धोवत बाड़ऽ?
बोलऽ बोलऽ ना वीर काहे चूप तुहूँ बाड़ऽ।।
का दया के बड़हन उफान जेकर रहे,
जे अगिआइल जोश अस बुतवले रहे,
कि तितकी का राखे ना गरम रहे।।
जे धरम के नाम लेले सेतिहे फूलल रहे,
थउसल तेजई पर ओढ़नी ढंपले रहे,
निरबल बना शांति के सपने डूबल रहे।।
उहे छाड़ि करम निपटावल
गाँछी त नाक दबावत बाड़न;
बरछा-तलवार गला गला,
तकली सुकुमार गढ़ावत बाड़न।।
नीमन नीमन लोगन के
गरमाइल जोश ठंढ़ावत बाड़न,
बाघन के बकरी कर देबे के
मन्तर साफ पढ़ावत बाड़न ।।
का चेला बना सँउसे संसार के,
गुरु कहावे के का बाटे नशा?
सूखल पिआसल धरती पर,
झूठा अमरित बरसावे के का बाटे लालसा ।।
गइल रहन पहिले ई सदेहे,
साधु-शिरोमणि संत पताले;
जा डूब गइलें रसातल में,
भल मानुस ई अपने समिटालें ।।
उनके अब धरम के मैजल के,
कान्हे उठा हम ढोवत बानी;
आपन खून बहा ललका,
सन्तन पाप के धोवत बानी।।

