गुरुकुल सोपान
दूर-दूर तक सुन्दर शीतल,
एक वन रहे पहाड़ के ऊपर;
पर्वत पसिनाइल अंकवारी लेले कुटिया,
झरना झरत रहे ओह ऊपर ।
पर्वत ऊपर समतल सुन्दर धरती,
एको छोट पथल दिखत ना रहे;
एक झोपड़ी बीचोबीच हरियाली के,
बस ऊपर में बइठल रहे।
सटले में काटल धन खेत,
पीअर चादर ओढले मुस्कात रहे;
चावल-कण के कूद-कूद के,
रूखी, खरहा, मूष, कबूतर खात रहे।
खाके अउँघाइल अलसाइल,
कुछ बचवन खातिरो राखत रहे;
पूजा के शाकल्य ढेर में मुँह लगवले,
गाय बछरूवा मातल रहे ।
बूतल रहे आग हवन के,
बाकिर हवा महक से मातल रहे;
मीठ महक अबहू तक,
निशिआइल हिरदा हर्षावत रहे,
हरियर पतई पेड़न के,
हवन धुआँ से धूप में अइसन लागे;
काजल आँख लगावल लइका,
अलसाइल झपकाइल लागे।
मिरगा घामा बइठ के पागुर,
बड़ा सुख से उहवाँ करे;
वन के जीव बील से बहरी,
बड़ा शान्ति से घूमे निडरे।
फीचल भगही संत नेहान के,
निचला आम डाल पर सूखत रहे;
खूब मुलायम चीक्कन कंकड़
जहाँ-तहाँ बिखराइल रहे।
कुश, पलाश, कमंडल, मृगछाला,
पूजा के चीज फैौलल रहे;
धनुष-बाण, तरकश, बरछा,
सभे भयावन टाँगल रहे।
चम-चम करत एगो फरसा,
कुटिया के दुअरा लउकत रहे;
लोहा के लाठी पड़ल दिखल,
जवना में आधा रवि बइठावल रहे।
मृगा छाल पर कुश बिछावल,
मन के बहुते भावल;
फरसा देख मगर मन में,
डरवा केहू घुसावल।
समर भूमि कि तपोभूमि ह,
तनिको समझ ना आइल;
जेकर हवन-कुण्ड, धनुष बाण भी,
उनके होई, सोच मन भरमाइल।
घीवढारी करछुल जेह मुनि के,
उनके होई तलवार, भान ना भइल;
बड़ा सोच में पड़ल जीव,
का ह साँच, ना झुठ बुझाइल।
का आइल बा वीर इहाँ,
तपवन में पुण्य कमाये खातिर;
कि संन्यासी साध रहल बा योग,
भुजबल बढ़ के खातिर।
सफल होई का देह पका के,
कि पायी खाड़ गे तलवार;
कि कवनो योगी से सीखो,
आइल बीर इहवाँ एक बार।
तप में तपल पास में परशु,
इहे वीर के शोभा देला;
नाहिं नपुंसक से तप होला,
ना तलवार हाथ में होला।
जे करी तपस्या ऊहे चमकी,
उनकर छवो दोष धोवाइल;
तन खातिर समर भूमि में,
बस तलवार ही काम में आइल।
कवन पुरुष तपलीन बा इहवाँ,
जे रखाले बा धेनुहा बाण;
एक साथ में तप भी करे,
लउकत होखे तलवार के तान।
एक पुरुष इतिहास में रहलन,
रण में टेढ़ रोष से भरल;
काल बरोबर तेजी तपबल में’,
जेकरा आगे सूरज के तेज छोट परल।
मुँहे वेद के ऋचा,
पीठ तीर भरल चोंगा के बन्हले;
कड़कड़ात तलवार चमाचम,
अपना हाथ में धइले।
संशय में शाप, हाथ में धेनुहा,
एह मुनि के बल साथे भइले;
कवन कवन ना गुण ऋषिवर के,
एके साथ पास में अइलें।
महाऋषि बल भरल,
परशुराम के इहे कुटिया हउवे,
बड़ पवित्र भृगुकुल वंशी,
अटल, निश्चली, ब्रह्मचारी वीर हउवे।
ह भाई ई उहे हवन,
कर्ण जाँघ माथा रख सूतल बाड़े;
पेड़ के नीचे कुटिया से,
तनिका दूरी पर सूतल बाड़े।
मीठ घाम माघ के,
लुक छिप के पतवन से आवत रहे;
थाकल मुनि के दरद, देह के,
धीमे-धीमे मिटावत रहे।
भक्ति भाव में लीन कर्ण,
बस मोहित हो जात ही बाड़न;
कबहूँ जटवन पर हाथ फेर के
कबहुँ पीठ दबावत बाड़न।
25 गिरत पत्ता देह ना पड़े,
चीटी ना देही पर चढ़,
सावधान बस कर्ण
कि गुरु के कचगर नींद ना टूटे।
झुरकल देह तप से दुबराइल,
तबहूँ हथियार चलावस;
हमरे कारण एह बुढ़ारी में,
गुरुवर अतना भार उठावस।
ढलल उमिरिया ओह से का,
देही में कतना ताकत बा;
रात-दिन हमरा भीतर बस,
अपनापन ही दीखत बा ।
सोचते गुरु के शब्द सुनाइल,
जबतक पुष्ट भोजन ना तुहूँ करबऽ;
अतना कड़ा पढ़ाई हमरा से,
कइसे सब जेहन में धरबऽ।
देखा-देखी में हमरे अस,
तुहूँ कम खाये जब लगबऽ;
जल जइहें सब खून तोहारों,
बाँचल रही ठटरिये तब।
तनिका सोचऽ जवन कड़ाई से,
तोहरा के हम राखीला;
दिन भर में एक पाव खून,
तोहरा से जलवायीं ला।
बैरागी तू बनब ऽ तब,
ई कहँवा से पूरा होइहें;
अइसन भूख चबइहें तोहरा,
कि सर्वनाश कर डलिहें।
चाही देह मांस पथल अस गठल,
हाथ होखे जस लोहा के लाठी;
जीत जवानी के होखोला,
जब नस-नस लहरे आग के काठी।
ब्राह्मण चहबऽ बनल तबो का,
खाना-पीना अबहीं से छोड़बऽ ?
चौथापन के ढलती बेरिया अस,
तप में हरदम का डूबल रहबऽ ?
तप-त्याग धरम ह ब्राह्मण के,
लेकिन लइको का त्यागी होला;
चून-चून दाना खाये के का,
जनमें से ऊ प्रेमी होला ?
कइसन बनल समाज विचितर,
ज्ञान के गठरी बाभन घर गीरल;
बनिया के घर मोती बरसल,
क्षत्री हाथ में खड़गे परल।
जइसे राजा होलन निरंकुश,
खड़गो होला बड़ा निरंकुश;
बिगुल बजावे रण में रोज,
राख सके ना ओह पर अंकुश।
ज्ञान के गठरी ढोवलो पर,
ब्राह्मण डरस, ना बडुवे हाथन हथियार;
राजा देलन विप्र के, विप्र राजा के,
लाज से, डर से आदर बारम्बार।
के सुनत बा ब्राह्मण के इहँवा,
लोग जे चहलें अपने मन कइलें;
धरती खून से रंगे में ही राजा,
हरदम रण के मन बनइलें।
चाहस ना गरीबी भागे, दुख भागे,
ना मालूम काहे के लड़े;
भटकल करम-धरम वाला के,
ना राह बतावे चुसहीं में रहस पड़े।
लड़ लड़ाई राजा,
अभिमानी अस सुख में फउकत रहे;
हड़प के प्रजा के गिनती बढ़वावस,
कि भावी दिन कुछ घटल ना रहे।
फैलल रहे राज्य के सीमा,
ढेर लोगन पर रोब से ऐंढ़त रहे;
जब नीयत ही बद राजा के होखे,
केहू कइसे उनका के कुछ कहे।
प्रभुताई कुछ अइसन बढ़े,
रण के बाद न पत्ता डोले;
चहलो पर राजा के उलटा,
केहू, कतहीं, कबहूँ, मुँह ना खोले।
अहंकार रोज बढ़त जाय,
जब जतने रण जीतत जाय;
माथा पर चढ़के लोगन के
आउर जोर मूतत जाय।
चिन्तन के दशा भइल अब अइसन,
कि जवने बडुवे सब राजा के बल पर;
ब्राह्मण खड़ा बेचारा काँपे,
खाली शंख गंगाजल बल पर।
ना बचल तेजई ब्राह्मण में,
कि राजा के मुरखइया रोकस;
पैर कुराही होखस बढ़बले,
तबहूँ ना शक्ति से उनका टोकस।
अब त ब्राह्मण के कहल बात,
केकरो नाहिं सुनाता;
राजा के लोगन से अब,
हरदम ऊ गाली खाता।
पंडित आउर तपस्वी के इहँवा,
तनिको सा भी बस ना चले;
यशी, अजेय राजा ही के,
प्रजाजन बस जय-जय करे।
जे समाज के पगड़ी रहे,
ओकर अपमान अब खूबे होता;
खिलल फूल अस कवनो तेज कह,
बस बरिआरन के बिरदावली होता।
दहक रहल बा लोभ के आग,
भोग खाली अब लउकत बा;
धसल जात बा धरती,
जइसे पापी के पाँव कहीं दबले बा।
खाकर के प्रसाद पाप के,
राजा सर्दार कहावत बाड़न;
ज्ञान, त्याग, तप, रही ना जिनका,
उनकर आसन ना ऊँचका बाड़न।
भूखे, लंगटे, घोर अभाव में,
जे केहू भी जीयत रहिहे;
आदर बिना भी ऊहो,
मानव के हित सोचत रहिहें।
कलाकार, कवि, कोविद भा
जे पढ़ल होखे सब पतरा पोथी;
सुधरल चाल, भरल ज्ञान के गगरी,
तबो ना उनका कबहूँ सुबरन होखी।
असली एह सब गहनन के,
जब तक दुनिया ना चिन्हीं
विद्वानन के राजा से बढ़कर,
पूजे के ना जबतक चिन्हीं।
लागल रही आग धरती में,
आउर अकुलाते ही रहिहें
कतनो करस उपाय दूसरों,
दुखवा से ना छुट्टी पइहें।
हारल थाकल जिह्वा समझावत,
ईच्छा चोट से चोटिआइल;
बिना हाथ हथियार के धइले,
कइसे केहू राजा के समझा पाई।
मरल विवेक सब रजवन के
, टोका-टोकी से ना सुनिहे;
फरसा से मूड़ी कटला पर,
तबे घमंडी आन्हर सब सुनिहें।
रे ज्ञानी जन अतनो पर त,
हाथन में धर ल हथियार;
नाहिं छुड़ावल दुख धरती के केहू
तुहू छुड़ाव अबकी बार।
रोजे-रोजे पढ़ावस गुरूवर,
खड़ग ही डर्र समवावेला;
जेही-सेही हथियार उठा ले,
ईहो नाहिं हो पावे ला।
दिल से कोमल जीव से कड़ा,
ऊहे हथियार उठावे पइहें;
जे हो इहें गंभीर बीर,
तप के बल जेकरा में होइहें।
ऊहे बीर ह जे बैरी पर,
जब भी हथियार उठावे;
जगतहित के प्रभुताई के,
कबहुँ भूल ना पावे।
जे हथियार समेटले रहिहें,
हमरा पास बस ऊहे रहिहें,
ब्राहमण छोड़ ना दोसर केहू,
कबहुँ भी हथियार के धरिहें ।
जब जब धेनुहा बाण उठाके,
हमहूँ खोल देखलाई;
गुरुदेव के आशिष सुनत,
हिरदा हमरो खुबे नीमन जुड़ाई।
कतना बढ़िया तीर तू मरलऽ,
जिअत रहऽ हे बालक;
बाण से वन जरे,
झरे खुशियन के आंसू हे बालक।
मन अपना के गरियावे लागल,
चित्त भी उबकाये लागल;
गुरु के बात, फिर आपन हाल,
तर ऊपर बटोराये लागल।
गुरु के सनेह ना केहू के,
अतना कबहुँ चूभल होई;
ना कवनो चेला भी गुरू के,
अतना कबहूँ छलले होई ।
कवन दोष बा हमरा में,
दो सर का कर पइती;
तिरस्कार के जहर घोट,
का द्रोण के पाँव में पड़तीं ?
का पाँव पड़ला पर भी,
ऊहो ज्ञान सिखवतन ?
का एकलव्य अस चुपके से,
दछिना में अंगुठा ना कटववतन ?
काहे जमले कर्ण,
जमलो पर वीर काहे के भइलन;
कवच-कुण्डल देह पर ओढले,
ई काहे के भइलन।
जवन जगह केहू गुण ना देखे,
ऊ देश गड़हा में डूबे;
कइसन होला ऊ देश जहाँ के लोग,
जाति-गोत्र बल पर ही आदर पावे ।
के पूछत बा कर्ण कइसन,
दानी, वीर, व्रती बड़ हवन;
सब पूछेला केवल,
कवन वंश के गौरव हवन।
ना केहू हो पायी चहलो पर,
जन्मल केहूँ के हाथ ना होला;
वंश कुल के चूनल,
केहू के बस के बात ना होला।
मुट्ठी भर के ब्रह्मा ऊपर से,
धरती पर जब छीटिहें;
बनल कियारी खेत जे बा,
तब बीआ बाहर ना जइहें।
जवने खोत में गिरिहें,
ओही में अपने आप ही उगिहें;
नर भी ओसहीं नीचे गिरते,
तरह-तरह के जाति में परिहें।
के कवन कुल में जनमल,
ई सब त अचके में होला;
नीच जाति पर तबहूँ इहवाँ
ठोकर ही बस होला।
सब गुण भरल रही तबहुवो,
जाति के चलते छोटा होला;
भरल रहे नीचतई तबहुवो,
ऊँचका जाति बड़ा बनेला।
हील डोल से हट के कर्ण,
मगन मन गुरू गुण सोचत रहले;
अतने में एक विषैला कीट घूसल,
जाँघ नीचे जवना पर गुरू सूतल रहलें।
पत्थर कीट कर्ण के जाँध, कुतर-कुतर के काटत रहे;
छेदत मांस के धीरे-धीरे,
ऊ भीतर में घूसत रहे।
व्याकुल भइलें कर्ण
दुष्ट कीट के कइसे पकड़स ?
हिलहूँ ना पावे देह तनिका भर,
ओह पिलुआ के कइसे पकड़स।
कीट जाँघ में जहवाँ घूसल,
ओहिजा हाथ पहुँच ना पावे;
बिना उठवले पैर कर्ण के,
बैरी कीट पकड़ ना आवे।
तनिको हिलते पैर,
गुरू के कचगर नींद बीचे खुल जाइत;
अइसे कइला पर गुरु भक्ति में,
का उत्तम अंक भेंटाइत?
गुरु सेवा से भरल बेचैनी,
ई सोचते ही मन सकुचाइल;
जतना भी खून बैरी पीअस,
मन में ठान रखाइल।
गुरु के कचगर नींद तोड़ला के,
माथा पर पाप हम नाहिं लगाइब;
सोचत रहलें कर्ण अच्छा ही होई,
जब हमहूँ ना तनिको जाँघ टकसाइब।
आसन से ना डोलले कर्ण,
मन मार के बइठल रहलें;
बिना आह के कइले
पत्थर दिल कर सहत रहलें।
अचके में गरमाइल खून,
गुरु के देह से सटल।
अचरज पड़ल खून के देखते
जब गुरुवर के निंदिया टूटल।
मिलते आदेश ईशारा से गुरू के,
कर्ण झपटले उठले;
छेद में अंगुली डाल के,
काटत कीट के बाहर कइले।
बोललन परशुराम, हो कल्याण
पर बड़ बेवकुफी तू कइलऽ;
मालूम ना कतना देरी से,
अतहत दुख के चूपे सहलऽ ।
कवनो दरद ना बडुवे बड़का,
कहलन कर्ण लजाते;
का करिहें ई छोट कीट,
बोललन कर्ण सुना के ।
सोचलीं, तनिको हील डोल से,
राउर निंदिया त टूटित;
पल भर भी राउर आराम में,
कुछ ना कुछ त घटित।
अपने से उड़ जइहें कीट,
ईहे सोच के बइठल रहीं;
छोट कीट के जीव,
हमरा के कतना दरदे दीही।
पर उड़ल ना ऊहो कीट,
भीतर घुस कइलखा हैरान;
देखख भी लेनी रउवा अपने,
एही लाजे बानी हैरान ।
होके गंभीर, परशुराम मन में,
ना जाने का सोचे लगलें;
अचके खीस के मारे आग अस,
उनकर देहिया भभके लगलें।
आँख गुड़ेर, पीस दाँत खीस से,
पुछलन, कवन छली रे तू;
ब्राहमण हवस भा कवनो,
बली वंश के बेटा तू।
दुखख-दरद के सहते सहत,
ब्राहमण कबहूँ ना जीयेला;
निशाना साधे खातिर भी,
अपमान के जहर ना पीयेला।
दारुण दुखवा जे सह पइहें,
ऊहे अपमानो घोटेला;
बुद्वि से ही बढ़त रहे,
आपन पराक्रम आँच चढ़ावेला।
चमकत ब्राहमण मरत रहे झकोराके,
ई ना कबहुवो होखेला,
आपन सुभाव कवनो हालत में
ईना छोड़ सकेला।
दरद बुझाई तनिका ब्राहमण के,
तऊ काहे के स्थिर होखस;
कांटा गड़ला के दरद पीरा त,
कवनो क्षत्रिय ही बस सहस।
रे पापी तू क्षत्रिय होइवे,
बोल नाहिं त एकर फल पइबे;
पड़ी कठोर सराप परशुराम से,
तब जलकर भस्म हो जइबे।
करीं क्षमा हे दयानिधि कह,
कर्ण, गुरु के पाँव पकड़ले;
गोइल उत्तर चेहरा के चमक,
थर-थर डरे काँपे लगलें।
सूत के पुत शुद्र ह कर्ण,
राउर दया बस चाही ला;
राउर पीछलग्गू चेला हम बानी,
जवने बानी ओतने मानी ला।
ना बानी हम छली लेकिन,
काम भइल छल के अइसन;
विद्या हासिल हेतु रहली,
बेमतलब मिलल बदनामी अइसन।
आशा रहे कि सहस्त्रार्जुन अस,
हमहूँ जयी चेला हो पइती;
बन बलगर तप के अंजोर से,
जग में धरम के नयका रूप बनइती।
बनल रहे सन्देह,
साँच बात पहिले जब रउवा जानब;
का रउवा कुछ पढ़ाइब ?
जन्मल नीच कुल जब जानब।
एही से आपन ह छोट जाति,
हम बतला ना सकली;
गुरूवर राखी विश्वास,
दोसर गीरह ना मन में रखली।
अतनो पर शरम के मारे,
पानी-पानी हो खत बानी;
बिना मार के भीतर-भीतर,
अपने आप ही मरत बानी।
छल से पावल आदर भी,
अपराध कहाला, पाप कहाला;
गुरु से उँचका बनल आज,
साँचे में ठगी बुझाला।
दानी, बली, बती होकर के,
अब तक आदर पवली;
जाके कहवाँ मुँह दिखलाइब,
आपन गुरु से छल जे कइलीं।
माथ झुकल बा रउवा आगे,
चाहीं त जार राख में बदलीं;
एक टीस बाकी बा बाचल,
जीवन-संकल्प ना पूरा कइलीं।
दीहीं सराप राख हो जायीं,
ईहे कृपा गुरु के अब होखे;
बाकी मद में चूर अर्जुन के माथा,
कइसे पाइब हे देव हम चोखे।
मन में लालच बा जय चाहे के,
ई ईच्छा का छूटे पइहें।
लेलही चाह अधूरा मरब तब,
प्राण पखेरु भरमत रहिहें।
दुर्योधन के हारल गुरूवर, ;
कसहूँ सह ना पाइब ,
बिन डर-भय के अर्जुन रहिहें दिखत,
तब रोजे-रोजे मरते हम जाइब ।
प्राण के भीख कबो ना माँगब,
परशुराम के चेला हई;
राउर चरण पकड़ले मरब,
तबहीं हमरा शान्ति होई।
हम बानी तैयार सरापी,
बाकी बड़का सुख के लेबे दीहीं;
आपन चरण कमल में,
हमरा के जान अब देबे दीहीं।
कहते कहत बकुलइलें कर्ण,
पाँव गुरु के छनलें;
गुरु आँखा से छल छलात,
प्रेम के आंसू टप-टप गिरलें।
बोले पड़ल गुरु के, कर्ण तू,
भारी बाड्ऽ अर्जुन अस बैरी पर,
निष्कपट दोस्ती के चाह से,
कौरव कुल जीतस अपना बैरी से।
अबहीं जनली तू रात दिन,
काहे अतना मेहनत में रहऽ;
हमरो हर एक बात के काहे,
मन के सितुहा में भरत रहऽ।
कतना चेलन के देखखले रहीं,
द्रोण के भी कुछ देले रहीं;
बाकिर खोद-खोद के जाने वाला;
एकहूँ अब तक ना देखले रहीं।
निरमलता के अपना बल पर
हमरा के तू बस में कइलऽ;
हम का जानी कपटी बन के,
लूटे खातिर तुहूँ अइलऽ ।
जतना सनेह भइल तोहरा पर,
ओतना दोसरा पर ना कइली;
सुतहूँ बेरिया धेनुहा पाठ,
तोहरा कान में फेंकत रहलीं ।
बिन कइले कंजूसी तनिको,
मूंगा, मोती आउर नगीना सभे दिहली;
तोहरे भीतर लगले पैठ,
आपन मन हम खिल-खिल कइली।
बोल रे पापी मुँहवा से अबहूँ,
एक्का के एकवान ना हवस;
पुरुषार्थ से भरल परशुराम के चेला,
ब्राहमण के बालक तू हवस।
सूत कुल में जमला पर रवि अइसन,
ढेरका तेज कहाँ से मिलल ?
जवन तेज बा मिलल,
के देखल कवच-कुण्डल से मिलल ?
बेटा अइसन मानत रहीं,
एही से जीवन दान बस दिहली;
आपन विद्या से,
पर एक बड़ा तेज हम छीनलीं।
जे ब्रहमास्त्र सिखवले बानी,
ऊ अब काम ना अइहे;
ई हे सराप बा हमरो कि,
ई विधा भुला तोहरा से जइहें।
कर्ण बेआकुल होकर उठलें,
ई का कइली हे गुरूवर;
कतना दारूण शाप के दिहली,
काहे जान ना लिहली हर।
बरसन के तपल पढ़ाई लिहली,
काहे ना जान के साथे लिहली;
कवना सुख खातिर धरती पर,
हमरा के अब जीये दिहलीं।
दाँती धर के अब सहऽ कर्ण,
परशुराम के शाप ना टरी;
माथ चढ़ा आदर से ढोवऽ,
अब ई ना टरी।
तनिका नाहिं कमाइल बाड़ ऽ,
एह महेन्द्र गिरि के ऊपर में;
हमरो बटोराइल ज्ञान के गगरी,
बा भरल तोहरा भीतर उर में।
एके ब्रहमास्त्र हेरइला से का,
कुछुवो ना आयी जायी ?
एके हथियार के आसरा से,
कवनो बीर ना हरदम जानल जायी।
नया लूर, नयका रचना,
नयका नजर भा नयका विधान,
नई कामना, नयका जोश से,
वीर नया पैदा के हवे विधान।
साहस से भरल तेज बा तहरो,
ऊपर से कवच-कुण्डल बा भारी;
एह सब के रहला पर जीत केहू का पइहें?
होखस चाहे जे जतना भी भारी।
फिर भी बरदान तू इहे ले ल,
जग में बड़का तूहीं कहइबऽ;
आपन तेजी से भारत के इतिहास,
जादे ही चमकइब।
चल जा आज्ञा बा कर्ण,
ढीला मन के करऽ कठोर;
रहे ना देनी इहवाँ शापित के,
चाहे लगावस जतना जोर ।
छिनला के कुछ दुख हमरो बा,
जतना गुण तोहरा के देनी;
होखत बानी ढेर बेआकुल सोचते,
ना जाने काहे के लेनी।
तप, पूजा के पालन कबहूँ,
असहीं करे के होला;
एक हाथ से दिहल चीज,
दोसर हाथ से लेबे के होला।
चल जा, चल जा कर्ण,
अकेलहीं रह पायीं कुछ मदद करऽ;
आंसू भरल नयन से मत देखऽ,
मत तोड़ऽ व्रत कइल हमार।
बुद्वि कहलख जे कइली, ठीके कइलीं,
लेकिन हम हिरदा से नाहिं;
झगड़ रहल बा हिरदा,
तोहरे जय मना रहल बा भीतर माहिं।
तोहर साधुता आउर धेनुहा बाण,
अचके सब मन में पनप रहल बा;
कवनो अँसुवन के गंगधार में,
गहराई तक भीतरे डूब रहल बा।
चल जा, चल जा कर्ण,
चुपचाप अकेले हीं रहे द;
लता-झाड़ी बीच बइठ के,
मन के रोग मिटावे द।
मुरझाइल देख तोहरा के,
छाती हमरो मत फाटे लागे;
डर बा मत शाप के लीही फेर,
बोली मत मक्खन अस पिघले लागे।
अतना कहते कहत आपन मुँह,
परशुराम पीछा में फेरलन;
टूट गोइल कर्ण के सुन्दर सपना,
उहँवे जहवा से लेलन।
पाँव पकड़ के गुरु के कर्ण,
आँसू के अरघ चढवलन;
भर पेट गुरू के देखत,.
धीरे-धीरे जगहा छोड़लन।
गुरु चरण के धूली ले के,
आपन हिरदा के भक्ति देलन;
व्याकुल उदासी से टूटल,
जस पहाड़ के चोटी से छुटलन।
सब भूल गइल कमाई जीवन के,
कर्ण सोचते-सोचते चललें;
के, लागल ढलत सूरज के
कवनो चाँद गगन ले चललें ।


