खट्टा राष्ट्रवाद
सुना था एक शंख नाद,
सर्व भुतेषु हिते रता,
था कठिन, पर था अच्छा
अच्छे से डरा, लांघ पाया नहीं कठिनता।
खोजा थोड़ा नरम, थोड़ा मुलायम, निकाल लाया, वसुधैव कुटुम्बकम; कितने छुटे, जीव-जन्तु क्या पता, खोजते रहा स्व कुटुम्बकम् ।
कुछ तप और किया, मिला,
बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय,
छुट गये लघुजन, छुट गया हिताय, सुखाय
वचा रहा उनके जिम्मे बस हाय-हाय।
संस्कृति लगा, शंकर की जटा छोड़, प्रवाह बन समतल पर आने लगी; बहुसंख्यक का ताने भरने लगी, तीसरे पाय दान पर पांव जमाने लगी।
भागिरथी के राहों को छोड़ने लगी, दिल्ली पर नजर गड़ाने लगी;
सागर पुत्रों का उद्धार छोड़ने लगी, खारा पानी कह छोड़ने लगी।
राजा दिलीप दे दिये अपने को,
शेर को, गाय बचाने को;
आज कह रहे, दुलीन दुहराने को, फिर भी गाय बचाने को,
संस्कृति अपनाने को,
जुठन बेर शबरी के, खाये प्रभु,
आज बेर नहीं, वैर लाने लगे;
सवर कर, कह शबरी को, नीजिकरण, भूमंडली करण गाने लगे।
फिर कोई परशुराम ऐन मौका पर, भूल जाने का शाप तो नहीं देगा,
विप्र पुत्र नहीं सुत पुत्र जानकर,
फिर कोई द्रोण सभा से बाहर तो नहीं करेगा,
कर्ण को जाति के नाम पर राधा पुत्र जानकर,
अगूंठा तो नहीं मॉगेगा, किसी एकलव्य से,
मूर्ति में भी अपने ही को जानकर।
द्रोपदी की लाज, चिर बढ़ाकर बचाया था,
पर भँवरी को क्यों नंगा घुमाया;
क्या यह बुआ की बहु नहीं थी,
या सभी थे अंधे पुत्र के अन्न से अघाया।
भरा रहे गोदाम अनाज से फिर भी, खाने को गुठली की रोटी;
कोई मजबूर तो नहीं करेगा,
विदेशी मुद्रा माना बढ़ा लेगा,
पर विकास दर घटा तो नहीं देगा ।
पता नहीं कौन बनेगा मोटा, कौन मोटी
खोज रहा हूँ कैसा हो राष्ट्रवाद,
कैसा हो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
क्या समता जैसा सुस्वादु होगा, या होगा विषमता भरा खट्टा राष्ट्रवाद ।


