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देवी जागरण-मातृ भूमि जागरण

देवी जागरण-मातृ भूमि जागरण

जब प्रकृति के थे करीब हम, कितना लगाव था हममें, हम थे निश्छलं, नहीं था आवरण कोई, नहीं दुराव था हम में।

मेरी छबी पर रहे लुभाते देव, स्वतः ही सुरलोक छोड़ आते थे; हवन, आचमन कर के तुम्हें बुलाते, नवरात्री पर बीच अपने पाते थे।

तब, था रहता कन्दराओं, गुफाओं, जंगलों में, नदीयों के घाटी पर, रेत पर; नहीं अट्टालिकाओं में, मठों में, मंदिरों में, नहीं, ध्वनि विस्तारक का, था गुलामं, था नहीं चकाचौंध बिजली का कोई घर।

था होता मिलन पुरूष-प्रकृति का, चेतन का अचेतन का, आत्मा का जीव का, परमानन्द पा जाता था; आंगन में घर ही पर।

आज भी सुनता हूँ नवरात्री में, ऋतु के संधि काल पर; तुम आवोगे वहाँ नहीं, जहाँ जाते थे देव लोक से धरती पर ।

हिदायत है तुमको, मत आना, सुरज ढलान के बाद मेरे घर पर;

दरवाजा बंद रहेगा अंदर से, पता नहीं आओ, न आओ; पहले चोरों का चरा हो;
आज तो हर ओर शुम्भ-निशुम्भ, मुखौटा सुर का पहन बैठे हैं;

रूप कुँअर और भँवरी बना दी जाती है नारी, फिर किस काली की शरण हो।

क्या देवी तेरी महिमा का उदारीकरण तो नहीं हो गया, मोटी थैली देख उधर सरकने लगी, प्रसाद पाने लगी, मात्र बीस को आशिर्वाद, अस्सी को गरीब बनाने लगी ।

सुना था भगवान गरीबों, दीनहिनों के बीच रहते थे, निषाद के पास, जटायु, गीध के पास, शबरी भिलनी के पास वानर सुग्रीव के पास, मधुबन में ग्वालन के पास विदुर के पास, गरीब सुदामा के पास, तो आज क्यों झोपड़ी को छोड़, निगमों के पास जाने लगी, हल, जुआठ का गीत छोड़, हार्वेस्टर का गाने लगी,

रेहट का राग छोड़, पम्पीग सेट को पटाने लगी ।

टमटम, साईकिल, बैलगाड़ी छोड़, मारूती, सुमो पर इतराने लगी, पुआल का बिछावन छोड़, डनलप का बिस्तर पर लुभाने लगी, ककहरा को छोड़ अल्फाबेट में बतियाने लगी।

तुम उदार थी, दयालु थी, निःशुल्क आशीर्वाद का निर्यात करती थी,

पर आज मुक्त व्यापार के फेरे में, न आटे का ऐपन, न गाय का गोबर लिपा चउका, न कोई गजामति का हाथ, आज तुम्हें कैसेट का चाहिए धुन, नेरे लॉक का रंग

थर्मों वाला कागज, रूम फ्रेशनर का गंध, चमक के लिए लेजर किरणों का साथ।

आज की गउरा, रगड़कर भॉग शंकर को नहीं देगी, ए गोश के पापा, हमसे भंगियाना घोटायी, गउरा कह देगी।

पश्चिम के दरवाजे घुस रहा विदेश माल, स्वदेशी का लाश घसीटने;

मुस्काता है वैभव पश्चिम का, स्वदेशी बन लगड़ा, अब रहा दुबकने ।

संविधान प्रदत्त समाजवाद को चिथड़ा करता, पूंजी वाद बजाता बाजा;

अग्नि साक्षी शपथ को भूल रहा, पश्चिम के सौतन को मेरा ही राजा।

काश्मिर हो रहा लहुलहान, संसद घायल, अक्षर धाम, रघुनाथ मंदिर पड़ रहा अचेत वार से; सर्व भूतेसु माँ कब अवोगी, आई. एस. आई, आतंक वादियों को खाने को।

बोलो राम फिर कब आवोगे शबरी के बैर खाने कन्हैया गोकुल में ग्वाल वालों के हाथ माखन खाने को।

मुण्डमालिनी, अत्याचारियों का रक्तपान कब करोगी गार-गार के, करो पैदा किसी अशोक को, ललायित हो रहा भारत अपना गौरव पाने को,

गये कहाँ चाणक्य, क्या भूल गये किसी को आज चन्द्रगुप्त बनाने को।

गोरी और गजनी को, पृथ्वी, नाग और आकाश से घेर रखा हूँ, नापाक के नाभकीय अस्त्रों को बील में घुसा देने का इरादा पाल रखा हूँ।

सैन्यतंत्र के कुत्सित इरादों को प्रजातांत्रिक तरीकों से दबोच रखा हूँ, है त्रिकाल महाकाल बढ़ चलो, शत्रु रक्त के लिए खप्पड़ पास रखा हूँ। पूंजी विनिवेश के शैतानी छाती को दण्डी मार्च के पैरों तले दबाना है, दंगाई से डरों नहीं, जगा दो माता, साबरमति के सन्त को फिर आना है।

रचनाकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित नाटक और कविता संग्रह यथावत से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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