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गोधरा

गोधरा-गुजरात-दुर्गध

चंदन के बदले माथे पर जब कलंक का टीका लग जाये: जग हंसायी ही होगी, मुँह दिखाने लायक न रह जाये।

घोर अवसाद से अन्तर्मन व्यथित हो जाता है,
खग को वेध गया व्याधा तीर, कवि लोट-लोट रह जाता है।
कवि का अन्तर्मन व्यथित, बोल गया सब कुछ;
होता न गोधरा, गुजरात न होता, बोल गया कुछ का कुछ।
उपन्यास सी, रह जाती एक अनुबुझ पहेली, गोधरा क्यों?
बिन माली का बाग का पौधा, कोई उखाड़ ले भागा,
खोमचे वाला बोला,
ये वाछी सी गाँछी मेरी, सीधे ही लौटा दो;
यह संयुक्ता नही है बाला, रेल ठेल को घोड़ा मत समझो,
द्रौपदी मत बनाओ, गोधरा को महाभारत बनने से बचा दो।

मैं मतवाला क्या जानूँ, क्या प्याला, क्या बाला, होती है ये कहासूनी,
मचने लगी कोलाहल बाजार से पटरी तक, रह गयी बात अनसुनी की अनसुनी ।

बस रूक गया चक्का, यूँ जैसे लगा, घोड़े का लगाम किसी ने खींचा हो;
द्रुतगामी साबरमती के सेवक टकराये, कहा सुनी के कंपन में ।

तव पितामह मौन, आज अब्बा, भाई जान का, जोश गया सींचा हो।

एक चिनगारी ही काफी होती है, इमारत को खाक मिलाने को,
डिब्बे बारूद को झेल नहीं पाये, धाम से वापसी, सुरधाम पहुँच गये, आये थे अलग-2 पर अब तो एक ही रथ पर चढ़, अंठावन चले गये,
जिन्दा चलते लाश की गंधों ने जाते 2 तांडव सूत्र दे गये।

गोधरा की लपट अहमदाबाद, राजकोट,
सूरत, बड़ोदरा पसर गयी क्षण में, झुलसा था अठावन,
अब तो सात सइया झुलस गया क्षण में;
डिब्बे की डोली के बदले,
रहीम की इमारत जल उठी क्षण में; लेने लगा फरवरी का सताइस
मार्च अप्रैल को अपने अंकों में क्षण-क्षण में बोगी नं-6 की उपज कर्फ्यू, फिर ढील, फिर कर्फ्यू, ये सिलसिला चलती रही;
बहत्तर घंटे भर में काबू करने का दंभ, पर उसकी भी हवा निकलती रही; हिंसा, प्रतिहिंसा, लूट,
आगजनी से फागुन-बसंत का मुह काला लगतें रहा, मानवता रोती रही, छटपटाती रही, कोई गति का तीसरा नियम पढ़ाता रहा।

बीछ गये शिविर राहत के,
शत सत्रह दिन काट रहे शिवरों में,
दो लाख चोटी को, खतना को एक लखा, सुना बटने लगा शिवरों में,
मानवाधिकार, अल्संख्यक आयोग, निर्देशों के पुड़िया बांटते रहे, कोहिनूरी गद्दीवाले।

स्वनामी छोटे सरदार को राजधर्म पढ़ाते रहे;
भूकम्प राहत में भी उठी थी उँगलिया और पदच्युत हुआ था कोई, प्राकृतिक प्रकोप था तब, मानवी अब,
राहत का रंग वही, क्या च्युत होगा फिर कोई।

बापू तुम गुजराती नहीं हिन्दुस्तानी थे,
नोआखाली गये थे इंसानियत जगाने को,
आज मैं भी हिन्दुस्तानी ही रहना चाहते हूं,
पर पहले रथी हूँ देर तो होगी जगाने को।

घटनाएँ होती हैं, पर सिद्धांत ढूढ़ना होगा,
नहीं तो खुद गढ़ना होगा, सुनियोजित और स्वाभाविक प्रतिक्रिया को समझना होगा;
क्रिया-प्रतिक्रिया, विपरीत और समान, कह न्यूटन को बुलाना होगा, पर अंठावन के बदले सातसइयाके भ्रम में असमंजस फैलाना होगा।

शाहआलम कैम्प और पणजी के संवाद समानता का रोना रोया जा रहा है,
साबरमती आश्रम के प्रहरी लायक तू नहीं, खाली करो कुर्सी, माँगा जा रहा है।

माघ का माघा पूनम और ऐसी जधन्य हादसा,
फुटा हत्या का अंकुर,
हो गयी न 27 फरवरी कलंकित,
स्नान दान भी विद्रुप;
कृष्ण द्वारिका सागर में सोये रहे, आर्तनाद भी नहीं जगा सकी उनको, सरयु तीरे कौशलेन्द्र गर्भगृह में शिलान्यास के तुमुल में अनसुना बैठे रहे चुप।

कोई कंहता गोधरा सुनियोजित,
कोई कहता हसन जाफरीवाला,
कोई कहता सलमा की स्वाभाविक प्रतिक्रिया, कोई सेवको वाला।

कह सुनाता हूँ अपनी व्यथा ।

दंगों के दंगल में जाति,
धर्म को जोड़ो मत,
फिरका परस्त, सिरफिरे की अलग होती है जाति,
धर्म; बह न तो हिन्दु होता, न मुसलमान, हत्या, लूट,
बलात्कार, व्यभिचार ही होता है कर्म।

हे राम, हे रहीम, हे कृष्ण, हे करीम, अब भी तो जागो, मासूम बच्चे, अबला, निर्दोष वृद्ध के चित्कार भी आर्त्तनाद ?

इसमें क्या कोई गज नहीं, कोई द्रौपदी नहीं ?

कितनी परीक्षा लोगे, देखना ग्राह और दःशासन निगल न जाये आज,

आओ बनायें, भय, भेद, राग, द्वेष रहित, समता मूलक समाज।

रचनाकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित नाटक और कविता संग्रह यथावत से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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