
कोलकाता/पश्चिम बंगाल (मनोज कुमार प्रसाद)26 मई। शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा 24 मई को आयोजित राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी ‘हिंदी पत्रकारिता : द्विशताब्दी की यात्रा, चुनौतियाँ और भविष्य’ में देशभर के साहित्यकारों, शोधार्थियों, पत्रकारों और प्राध्यापकों ने हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक भूमिका, डिजिटल मीडिया, ट्रोल संस्कृति, भाषा संकट और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम की शुरुआत ‘शब्दभूमि प्रकाशन’ के परिचय से हुई, जिसमें संस्था को साहित्य के संवर्धन, संरक्षण और प्रसार के लिए कार्यरत सहकारी साहित्यिक मंच बताया गया।
संगोष्ठी की संचालिका गायत्री ने कहा कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं बल्कि समाज की वैचारिक दिशा तय करने वाला बौद्धिक उपकरण है। उन्होंने ‘उदंत मार्तंड’ से लेकर डिजिटल मीडिया तक हिंदी पत्रकारिता की यात्रा का उल्लेख करते हुए कॉपी-पेस्ट संस्कृति, भाषाई प्रदूषण और एल्गोरिद्मिक नियंत्रण जैसी चुनौतियों पर चिंता जताई।
दरभंगा के आशीष अम्बर ने हिंदी पत्रकारिता के भविष्य और नवाचार पर विचार रखते हुए कहा कि नई तकनीकें पत्रकारिता को अधिक लोकतांत्रिक बना रही हैं। तमिलनाडु की डॉ. बी. मल्लिका ने हिंदी पत्रकारिता को जनजागरण और सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बताया।
मुंबई की शोभा नागप्पा माली ने प्रिंट मीडिया से डिजिटल मीडिया के संक्रमण और फेक न्यूज़ के संकट पर चर्चा की, जबकि बिहार के डॉ. श्वेत प्रकाश ने ‘पोस्ट-ट्रुथ’ और ट्रोल संस्कृति को लोकतांत्रिक विमर्श के लिए गंभीर खतरा बताया।
महाराष्ट्र के राहुल भीवा हतागले ने समाज सुधार और जनजागरण में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका को रेखांकित किया। भोपाल की डॉ. कमलिनी पशीने ने हिंदी पत्रकारिता की 200 वर्षों की यात्रा में भाषा और वैचारिकता के विकास का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया।
झारखंड के संजय प्रियंवद ने सोशल मीडिया और पत्रकारिता की बदलती दिशा पर चिंता व्यक्त करते हुए पत्रकारिता की विश्वसनीयता को सबसे बड़ी चुनौती बताया। प्रो. निलोफर राशिद शेख ने पत्रकारिता में नैतिकता और मूल्यबोध की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि शांति सोनी ने स्त्री दृष्टि और संवेदनशील पत्रकारिता के महत्व को रेखांकित किया।
मुकेश राम ने ग्रामीण समाज और जनपक्षधर पत्रकारिता के प्रश्नों को केंद्र में रखने की आवश्यकता बताई। रूपा कुमारी ने नई पीढ़ी, डिजिटल अभिव्यक्ति और भाषा संकट पर अपने विचार रखे।
कार्यक्रम के दौरान कुछ अज्ञात लोगों द्वारा ऑनलाइन व्यवधान और अभद्र टिप्पणियाँ भी की गईं, जिसे आयोजकों ने सुनियोजित डिजिटल हमला बताया। इसके बावजूद संगोष्ठी निर्बाध रूप से जारी रही।
संगोष्ठी में वक्ताओं ने हिंदी पत्रकारिता को लोकतांत्रिक चेतना, सामाजिक परिवर्तन और वैचारिक प्रतिरोध का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
