
RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)21 मई। डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित नाटक और कविता संग्रह “यथावत ” की पहली रचना एक भोजपुरी नाटक है……
ठठपाल के ठिकाना
परिवेश- माघ के महीना, ललकरले पछेया हवा, ठंढ से दलकत साँझ, दलान पर दमकत कउड़, घेरा मरले बइठल लोग।
नेपथ्य से-
भोले शंकर पीअऽ हलाहल, का करबऽतू लछमी के;
गंग, लघु चन्द्र, पनंग, भस्म के संग मड़ई में रहबऽवइठल लेके तू बैला के। जब तक भूखा नंगा ना खायी, का होई मंदिर बड़का बनवला से; केहू जल ढारी, केहू दूधो भी ढारी माँगी तोहरा से थैला के, अवघड़ दानी सबके दीहऽ बिना भेद के, केहू फूल ले भागल, केहू भागल ले लछमी मइया के; धतूरा के पतवा वाँचल बा, लाज रखीह इहो चढ़इला के।
बहोरन- सूनत बाड़ऽन भरेठ भाई, तवो तू लछमी के पीछे काहे धा-धा के हाँफत रहल ? जानलऽना कि उ बड़ा छामक-छुमक वाल हई, जे उनका के लटका-झबिआ गाँथी, उनके साथ हाट-बाजा जाइल चाहे ली, ना त पट से टुपना पसार के कुछ ना कुछ फरमाइश करते रहेली, चुप रहे वाला ना हई। लोग कहेलन चंचला हई।
लटकू – का बहोरन ! भरेठ के कौन वेद पढ़ा रहल बाड़ ?
मियाँ-बीबी के खटिआ अलगा करा के छोड़बऽ का ? ना भरेठ, तू इनका बात पर कान मत दीह ई मन्तर पचासहा लोग खातिर ह। तू त अभी तीस साल के भीतर ही होइबऽ उमिर खेले खाये वाला बीया अभी खेलऽ खा।
भरेठ- अच्छा ! तोहरा लोग के, बतकही, धीरे-धीरे करे ना आवेला का? जानेलऽ कि ना, ठठपालवा के माई के एगो कान दुअरे तरफ लागल रहे ला।
सुनी त हजामत हमार बनी, तोहरा लोग के थोड़े बनी। तोहरा लोग के अइसन बात अपना दुअरा दलाने पर उकसावल ठीक लागी का ?
नेपथ्य से (ठठपाल के माई)-केने बाड़ऽ हो,
तनिक बतकुचन बंद करऽ आके देखऽ पाड़ा पगहा तुरवले बा, आ भईस दूध पिया देलक। दूध पी-पी के अतना जोमगर भइल बा कि हमरा से खींचले खींचात नइखे। जल्दी आके वान्हऽ नात चाभे के बेरा मुँह लटकइहऽ।
(भरेठ दउर के पाड़ा बांधे चल जात बाड़न, आ ओने से ठइपाल गेन्दा खेलके लवटल आवताड़न)
ठठपाल- पाँव लागत बानी ए काका, पाँव लागत बानी ए चाचा।
बहोरन लटकू (एके साथे)- जीअत रह बेटा, जीअत रह।
बहोरन- एहू ठंढा में तोहरा उखम फेकले बा का ए बबुआ ? सब केहू ठंढा से घर में सुटुकल रहता बाकी लड़िकन के असर कहाँ पड़त बा। जा, जाके हाथ-गोड़ धो के चूड़ा-गुड़ घोंघिआव।गरम-गरम दु गिलास गोरस दरका ल।
लटकू- का हाल बा बबुआ ? आज गोल केने दगाइल हऽ राम-नगर जीतल ह की वशिष्ठपुरी।
ठठपाल- आज के मैच त बराबरी पर छोड़े परल ह। मौसम के मन बुझाइल ह कि बिगड़ी, बरफ अइसन पानी टपके लागल ह, बस बीच में खेलवा के बंद करे पड़ गइल ह।
बहोरन- लइकवा के खाये पिये देबऽ कि ना ए लटकू?
बइठल-बइठल वात में बात फेंटले रहबऽ कि छोड़बो करबऽ, ना जानेलऽ एकर रेडिया खूली त बात ओराये के नइखे, चरवही में के बात भी बतलावे लागी।
ठठपाल- खाये त हम जइबे करब, लेकिन काका, आज के नया खबर ई बा कि भईस चरावे, जगजीवन कॉलेज के मोड़ पर गइल रहीं त एगो जीप से लाउड स्पीकर के भोंभवा से बोलत रपटले जात रहे, कहत रहे कि 14 से 28 फरवरी तक जगहे-जगह ‘स्वस्थ यौवन मेला’ लागल रही। मेला में सब सेयान औरत-मर्द आके जाँच, दवाई के सेवा से लाभउठावस। काका ! बाकीर हमरा बुझइबे ना कइल कि ई कवन मेला ह। हम ब्रहमपुर के मेला, कस्तर महादेव के मेला, श्री पालपुर के मेला, भलुनी धाम मेला, राजगीर के मेला, चौहरमल के मेला त देखले सुनले वानी । भोजपुर विकास मेला भी ब्रहमदयाल बाबा संगे घूमेक देखलेबानी। बाबूजी के साथ भईस बेचे गोइल रहीं त ब्रहमपुर आ श्रीपालपुर मेला देखले रहीं। शिवरात के बेरी माई संगे कस्तर महादेव मेला देखे के मौका मिलल रहे, आ लवटत समय भलुनी माई के मनौती उतारे के सिलसिला में उहो देखले बानी। राजगीर के मेला के त कहहीं के नइखे, जब रसरिआ वाला झूलवा पर चढ़ के पहाड़ पर पहुँच के बौद्धस्तूप के दर्शन भइल रहे, फिर नीचे उतर के गर्म कुंड में नहा के मिजाज के हरीयर कइले रहीं। बाबा चौहर मल के मेला में जब गोइल रहीं तब मजार पर चादर भी चढ़ा आइल रहीं।
लटकू- जा बबुआ, पहिले कुछ दाना-पानी पेट में डालि आवऽ, एके नधले बोध गया, तख्त हरि मंदिर आ हरिहर मेला के भी बखान करे लगवऽत ओठ झुरा जाई, असहीं हकासल पीआसल गेंदा खेल के लौटत बाड़ऽ। जानत नइखऽ, बहोरन भाई थोड़हीं देर में टोकवे करीहें।
बहोरन- कहत रहीं, ठठपाल कवनो पटना रेडियो थोड़े हवन कि थम-थम के, रूक-रूक के बोलीहन, ई विविध भारती हवन, चालू भइला के बा, लेत ना रह सुनेके मजा।
ठठपाल- सूनऽ काका लोग, असी मजदार, दमदार मेला के त बेआन अभी बाकी रहल बा। एक बे पटना गोइल रहीं, देखलीं, गाँधी मैदान में पुस्तक मेला लागल रहे। लोगन के मुताबिक राष्ट्रीय मेला रहे। मन भइल देखे के, बस दो रूपिया के टिकट ले के भीतर ढुकलीं, देखत बानी सब दुकान किताब से ठकचाइल बा, देखे वाला के हुजूम असहीं ठकचल रहे। पढ़नीहार लइका लइकी से दुकान छापाइल रहे, आपन-आपन पसंद के किताब किनत रहे लोग। राजेन्द्र साहित्य परिषद् के तरफ से बीच में सभा होत रहे आ वलभद्र कल्याण जी के भाषण होत रहे।
लटकू- कवनो किताब खरीद के ले आइल बाड़ऽ का बबुआ ?
ठठपाल- ज्यादे पढ़ल त हम बानी ना, तबो काका हाथरसी के कह-कहे वोला एगो किताब खरीदले बानी, चालीस रूपया के किताब छूट काट के बत्तीसे में मिलल ।
बहोरन- एगो कह-कहा सुना देत, तब मजा आ जाइत।
ठठपाल- सुने के मन वा त सुन जा। चार गो राज्य उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, मणीपुर, पंजाब में चुनाव हो रहल बा। देश के विकास के मुद्दा छोड़-छाड़ के सबकेहू भ्रष्ट्राचार, आतंकवाद, पोटो ताबूतकांड, राम मंदिर निर्माण, जंग के तैयारी, अइसन बात में जनता के अनुरा के राख देले बा। एह चुनाव में कतना लोग पटखनीया खाई।
हाथरसी के अनुसार :-
सेवा-भाव बचपन ह, इलैक्शन जवानी ह,
पराजय बुढ़ापा ह, आउर एकरा बाद
जीप नहीं, फोन नहीं, माईक नहीं, मंच नहीं, माला नहीं, प्याला नहीं, कोठी नहीं, कार नहीं कुछुवो ना रह जाला, खाली-खाली डेरा ह, सारा मुल्क अंधेरा ह, न हमार ह, न तोहार। ह, ए भाई वोट डालते रहो।
बहोरन- ई बात जान लेवे के बा, आज के नेता गरजे वाला बादल हवें, कबहू बरसे के हाल ना जानस, आ जनता त्रिशंक बना के लटका देली-
ना हाथ सुझे, ना फूल दिखे,
लाल चदरिया दरका निकले;
हरा बिस्तर दिखे चौपड़ सा,
अब हम सफर कैसे निकले।
लटकू- फिर का होई बहोरन भाई, कइसे नीमन राज चली ?
बेंग छउकउवल गठबंधन कबतक ?
बहोरन- लागता पंचाली बन ही के पड़ी, सबकर भार सहहीं के पड़ी, चौखट पर चटकी अगर छोड़ आवस, त पारा पारी सब के खुश करहीं पड़ी। केहू रेल के गुल्ली माँगे त, देवहीं के पड़ी, मंत्री पद के चटनी चटावही के पड़ी। बलहीन दलहीन, जवन पलड़ा पर बैठस, पलड़ा ओनही झुकी, त ओइसन सरकार बनावही के पड़ी।
ठठपाल – ना काका ना, निराश ना होखे के। किरिन फूटे के आशा में रात कटबे करेला, जाड़ा में गरीब मुठ्ठी वान्ह के रात काट लेला कि भोरे धूप तापब। बस हमनी के करे के बा-लुटेरा, व्यभिचारी, खूनी, घोटाला बाज, डंडी मार, नकलची तक के छोड़ी। असली,युवा, दक्ष, रक्षक से नाता जोड़ी जय माला उनके पहिनाई, फेरा जाति आउर मजहब के छोड़ी।
लटकू- वाह ! वाह ! वाह ! वॉह त आगे का भइल ठठपाल ?
अच्छा, दंगा के दंगल के बीच वोट बटोरे के नीयत रहे तब का होई ? का राजधर्म के धर्म दंड बीच में रखल जायी।
ठठपाल- मेला में से निकल के उतर-पूरब तरफ के कोना तरफ जंक्शन के टेंम्पो पकड़े बढ़त रहलीं, त सामनहीं कारगिल पार्क पर नजर गड़ गइल। पार्क के बीचो-बीच उलटल बनूक पर हैट लटकावल एगो सेना के जवान के मूर्ति बनावल रहे। लोक कहेला उ शहीद के मूर्ति ह। हमरा त सब मेला से इहे अच्छा लागल। बहुत देर तक श्रद्धा से शीश झुकवले रहीं, मन करत रहे हमहुँ कारगिल में जाके लड़ल रहती। हमहूँ गणेश, बिक्रम, मनोज, हरदेव, विद्यानन्द अइसन शहीद बनल चाहत रहीं। हम रहतीं त सीमा रेखा के फान के दुश्मन के केतना जवान के पॉखुर उखाड़ फेंकले रहतीं। हमना सोचती, बाद में हमरा खातीर देशी, ताबूत काम में आई कि विदेशी। काका मन में ठनले बानी त बनबे करब। कुर्बानी के निशानी त लेके रहबे करब, बाकी भारत माता के छटपटाइल ना नु देखब।
लटकू – धन्य ह, धन्य ह ठठपाल। बबुआ तोहरा भीतरे हमनी के कवनो, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, असफाक उल्ला खाँ, मंगल पांडे, सुभाष बोस के चेहरा देखत बानी। नेता लोग चाहे देश के जतना नोचस-खसोटस, चारा खास, चाहे तहलका वाला लूटस, चाहे भूकंप राहत गड़बड़ावस, चाहे कमल कलश में शालिग्राम भगवान केकिरासन तेल में डुबा देस, लेकिन तोहरा अइसन सैनिक अगर देश में तैयार हो जास, कवनो ताकत, देश के ड़िगावे ना पइहें। बबुआ! रवा-पी के बलवान बनऽ, नीरोग रहऽ तवे नू देश खातीर जान लड़इबऽ
ठठपाल- बलवान बनहीं खातीर त पूछ रहल बानी चाचा-स्वस्थ यौवन मेला का ह। एह मेला में काथी बेचल जायी। लोग के सबल बनावे में मेला कइसे मदद करी।
बहोरन- देख ए लटकू भाई, ठठपाल बेटा त बड़ा चलाक होखल जाता। देश खातीर जान लड़ावे के सीख गोइल। स्वास्थ्य के बारे में भी सजग होखल जाता। हम जानत रहीं कि खाली भईस चरावत होई, साग-रोटी खा के दूध पीअत होई। एकरा अतना बात, ढेर पढ़लको लोग के ना बुझात होई, ना जेहन में रह पावत होई, ना सोच समझ केहू के होई।
लटकू – का हो ठठपाल, तू कवन स्कूल में पढ़ऽलऽ, सरकारी स्कूल में कि पब्लिक स्कूल में। झोंपड़िया स्कूल में कि जिन पाल में।
ठठपाल- काका, हमरा से मत कहवावऽ, तोहरा से कवन बात छीपल बा। देखबे करेलऽ दिन-दिन भर भईस चरावत रहीला।
लटकू- तु चारावाहा स्कूलि के विद्यार्थी हवऽ का हो ? बिना किताब-कलम छुअले क्लास टपल जात बाड़। देखीह, कवनो एन. सी. ई. आर.टी. कहीं सिलेवसवो मत बदल दे। पाठे मेंफेट-फाट मत कर दे कि फेर से कचहरी जाये के नौबत लागे लागे।
ठठपाल- जानत नईखंऽ चाचा, हउ, मड़ईया वाला प्रकाश भैया बाड़न न, उ दिन में बगइचा में अमरूद अगोरेलन, जेने भैंसीआ चरावे जाईलाजा। उ अखबार पढ़-पढ़ के सब चरवाहन के रोज-रोज के बात बतावलन। उहवाँ डमरूमल सोरठी वृजाभार सुनावलन, कैप्टन काका आल्हा उदल गा के जग-जगा देलन, एक तरफ खरहरे खेत में मुसचन्ड डंड पेलत रहलन। दुपहरीया में गोपाली बावा लाचीदाना-बादाम फंटल प्रसादी बाटलन। बीच-बीच में गुंजन भैया के टीम साथे मैच भी हो जाला, ओह में राहुल भैया के जब कमेन्टरी होखे लागला त हँसत-हँसत पेट फूले लागला। आजकाल चरवाहा स्कूल में भी सरब शिक्षा योजना लागू बा, छूटल छाटल के भोर त अंजोर करबे करेला, आँगनबाड़ी भी पीछे ना रहे। बिहार शिक्षा परियोजना त औपचारिक, अनौपचारिक हर तरह से तैयारे खड़ा बा।
बहोरन – अइसन तरीका हमनीओ के बेरी रहे, चरखा भी कातत रहीं जा, आ रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीताराम भी सीखत रहीं जा।
लटकू- हमनी के पढ़ावल जात रहे-राम-रहीम, अल्लाह ईश्वर एके के नाम ह। तजेया के दिन दादी करबला पर मलीदा चढ़ावे जात रहे, त खलीफा बाबा भी दशहरा में गदका हमनी के वीच आके खेलत रहन। सांझी खानी केकरा छप्पर से धुँआ ना नीकलल देखल जात रहे, उनका के खाना खीआवल जात रहे। आज अइसन बम आ विस्कूट एके थैला में गिरा के फर्ज ना निबाहल जात रहे।
ठठपाल- लेकिन असली बात त बहकले जाता काका। स्वस्थ यौवन मेला के वारे में तू लोग के अधिका जानकारी होखे त बताव जा। अगर ना मालूम होई त प्रकाश भैया थोड़े देर में लवटहीं चाहत बाड़न, उहे सब बात हीगरा-हीगरा के बतलईहन। तनिका पछीमा ओर देखल जाय लागत बा उ हे आ रहल बाड़न।
(प्रकाश आ गइलन)
प्रकाश- प्रणाम काका लोग के। आ भरेठ काका केने बाड़न हो. लउकत नइखन। ठइपाल ! तू त ठीक-ठाक बाड़ऽनूऽ
ठठपाल- सब हाल-चाल ठीक बा भैया। हमनी के कबेसे एगो भारी असमंजस में पड़ल बानी जा, तनिका तू मदद करऽ।
प्रकाश- हम कव ना कहतानी। कहबो त करऽ।
ठठपाल- अच्छा भैया, ई स्वस्थ यौवन मेला का ह, तनिका साफ-साफ फरिआ के बता द।
(अतने में भरेठ भी आ जातवाड़न)
प्रकाश- प्रणाम ए काका। अच्छा सब लोग ध्यान से सुनऽजा.
(फरवरी 2002 में) 14 से 28 पूरा पखवाड़ा ब्लौके-ब्लॉक 20-20 जगह स्वस्थ यौवन मेला लागल रही। एह मेला में 15 से 50 साल के उमर वाला औरत-मर्द सव केहू के स्वास्थ्य जाँच होई, आ दवाई बाँटल जायी।
ठठपाल- अतना त बुझा गोइल, बाकी बीमारी के बीचे उमर के फेरा कँहवा से घुस गोइल। का एकरा से छोट आ बड़ उमर वाला के रौगवा फेरा में ना डालेला का भइया ?
लटकू- कइसे दो कहल बा, बिलार का जाने सिकहर के भाव । दूध कतनो उपर राखल जाय, विलार त लपक के हाथ मरबे करी। रोग बुतुरवनो के होखेला आ वुढ़वन के भी ना छोड़ेला।
प्रकाश- इ बात त ठीके कहलऽकाका, लेकिन स्वस्थ यौवन मेला न सव लोखे खातीर ह, ना सव रोग खातीर। मेला में सेयान लोग के केवल गुप्त रोग के जाँच होई।
ठठपाल- गुप्त रोग का ह भैया। एकरा के तनिका आउर खोलके बताव। हमनी के त दमा, टी.वी., कैंसर, हैजा, मियादी बुखार, जड़ैया, औरतन के प्रसूत, नन्हीं-नन्हीं लइकन के दूँतउटी आ छूटल-फूटल के नोचनी होखत सूनले जनले वानी जा। जमाना के साथे-साथे पोलियो, कालाज्वर भी जाने में आइल, आ खदेरल भूत जइसे पीपल के गाँछ से उतिर के घर में घुस जाला ओसहीं शिमला के सेव के गाँछ पो से प्लेग के उतरला के धमक सुनाइलह, वाकी गुप्त रोग ना सुनले रहीं। स्कूलवा में माहटर साहेब एक वे भले गुप्तताप बतावत रहन, का इहो कवनो ताप वाला चीज का ह ? जइसे हमनी के कम्प्यूटर आ वेभसाइट सुन के चिहाइल रहिला जा ओसहीं मेला के नाम आ रोगवा के नाम भी नया बुझाता, सरकार कइसन कइसन चीज निकाल के ले आवेला हो।
प्रकाश- ठीक ठठपाल, ठीक। तोहरा, बात में कुछ दम बा। पहिले एह रोग के बारे में बहुत कम जानकारी रहे, एही से जानकारिए इलाज ह कहात रहे। रोगवा त पहिले भी रहे, यौन रोग कहात रहे, डा० लोग भी. डी. कह के काम चलावत रहन, गर्मी सुजाक एकर कारण बतावत रहन। अब ओइसने रोग के नाम ‘एड्स’ रखा गोइल बा।
ठठपाल- भैया ! रोगवा होला कइसे हो ?
प्रकाश- जानलऽ की चोरी-चोरी, चुपके-चुपके जवानी में केहू के गोड़, कहीं उँचा-खाला पड़ल कि रोग आपन डेरा शरीर में डालि देलक। लोग रोग के छिपा के पोसत रह जाला, लाजे बतावे में हिचकिचात रहेला, आ रोग भीतरे भीतरे देही के घून अस चबावत रहला।
उठपाल- एकरा के कंहू कइसे रोकी भैया ? एक ओर मन पनपनावे स्त्रातीर भीआगरा बाँटल जाता, त दोसरा ओर पेनीडोर के छनछनात सूई भोंकल जाता, ई दुरंगी चाल कवले चलीं। कहाँ भगलन धनवन्तरी, कहाँ भगलन हनिमैन, कहाँ भगलन हिपोक्रेट।कफ-पीत-वायु आ सोरा-सिफलिस साइकोसिस के मंतर के हवा निकल गोइल कि अब खाली टोपी पेन्हावे वाला, जाली लगावे वाला दवाई के परचा बँटाता। सुनल जात रहे कि ई बीमारी पहिले अफेरीकन देश में होत रहे, त हमनी ओरे कइसे जोर लगाके पहुँच गोइल।
प्रकाश- सुने में आइल ह कि एन.एच. के किनारे-किनारे व्यभिचार के अंडा जाल अइसन फैलल बा, ट्रक ड्राईवर ओह झोंझ में पड़जालन, बस उनके देहि धइले, लाइन होटल के रास्ता पकड़ले सगरो फैलल जाता। अगर एकरा के तत्काले ना रोकल जाई, त एक दिन सब केहू के नाश कइके छोड़ी।
ठठपाल- ठीके कहल बा, घरवाली के रहते बाहरवाली पर बुरा नजर ना चलावे के!
बहोरन- लेकिन अइसन गलती त एक बे इनर से भी भइल रहे।
लटकू- गलती भइल रहे त उनका सजाय भी भइल रहे। गौतम ऋषि के शाप पड़ल रहे कि ना ? अहिल्या त पत्थर भइबे कइली, इन्द्र के देहि में हजार गो छेदे छेदे भइल रहे कि ना ?
बहोरन- तुलसी बाबा भी त मानस में चेतइले बानी-
गुन मंदिर, सुंदर पति त्यागी, पर त्तिय लंपट, कपट सयाने मोह द्रोह ममता लपटाने।
भजहिं नारि पर, पुरूष अभागी,
लटकू- बहोरन भाई, हर नारी में माता के रूप देखे के चाहीं। कहल बा परदारेसु मातृवत।
बहोरन- लोग जब अइसने सोचे लागस त हाँच में कइसे पड़ीहें, गुप्तरोग-एड्स काहे के होखे जास।
ठठपाल- एह खातीर मेला लगावे के का जरूरत बा भैया। हमार भैया जब परदेश जात रहलन, दादा जी उनका के समझइले रहन। दादा जी से सुनल बात बता देत बानी। कहले रहन बबुआ, परदेश में जीभ आउन लंगोटा हरदम कसले रहीह, फिर तोहरा पासे रोग कबहुँ टिटकारीओ ना मार सकस।गाँधी जी के इंग्लैंड जाये के समय उनकर भाई पुतली बाई भी त इहे शिक्षा देले रही। इहे नुस्खा काहे ना सब केहू के बतावल जात बा ? अइसन छोट मंतर के पालन करे में कवन हींग फिटकरी लागे के बा। अब आगे बर्तावऽ भैया।
प्रकाश- मेला में डा० रहिहें, जाँच के साधन रही, दवाई रही, कुछ पम्पलेट त रहबे नू करी।
भरेठ- मेला देखे में टिकट कतना के कटावे के पड़ी, डा० के फीस, जाँच आउर दवाई में पइसा कतना लागी बबुआ ? मोरारजी भाई वाला आपन मूत पीये वाला नुस्खा त ना नु बाँटल जायी ?
प्रकाश- पैसा वैसा कुछुवो ना लागी काका, सब कुछ त मुफ्ते में मिले के वा। मूत वाला नुस्खा पर चौंकत काहें वाड़, ओकर नाम शिवाम्बु ह। केशव बाबू कतना रोग के एही से दफन कर देलन।
लटकू – फोकटीआ काम का कबहू अच्छा होला बबुआ ? डा० लोग झूठहुँ के रोग बता के बाद में फेरा में डाल दीहन तब ? अस्पताल में जायी, डा० नदारद, उनकर कुर्सी हरदम ढनढनाते रहला, दवाई लागला कि रोगी से पहिलहीं सरग में ऐड़ा मार के बइठल रहेला। जायीं ना डा. के निजी क्लीनिक में, लागी की मीठा-मीठा बोल के गरीब के सबपइसा एके बे में ऐंठ लिहन। एने गरीब के चेट ठंढाई, ओने रोगी के तुलसी गंगाजल मिले में देर ना रहे जाला। अइसन हालत में मेला के डा० दोस्ताना सलाह, जाँच, दवाई सब औरत-मर्द के मुफ्त में कइसे दीहनजा ?
बहोरन- जब प्रकाश कहत बाड़न तब एक बे चल के देखे-बुझे में लागते का बा ? कबो कबो विश्वास भी करे के चाहीं। कहल वा-विश्वासम् फल दायकम्। दुनिया त अइसन आस्था-विश्वास में ढेर जगर अझुराइल बा, तब का रहल छोड़ दिहल जाय। अगर डा० लोग सरकार के कहला के अनुसार ना चल के धोखा दीहन तब उनका नरको में ठेला-ठेली करे के पड़ी। चल के देख आवल जाय मेला।
भरेठ – लगलऽन अब कर्मकांड के पढ़ाई पढ़ावे। अरेऽ कह की मेला-ठेला में जाये से कुछ ना कुछ अनुभव होते रहला।
बहोरन- तोहरा नौ बुझाला छव नइखे बुझात। हम त जइबे करब मेला में। जब मुफ्ते में सब काम फरीआ जाई, तब एह से अच्छा का बा। हमरा घरवो वाली रोज रात भर खों-खों करत रहेली। दवाई ओकरा देही में लागत थोड़े बा। ना मालूम कवन रोग पकड़ले हइख। एगो बीस वरिस के नाती बा, लागेला ओकरा देही पर रोहानी नइखे चढ़त। अतना दूध-फल, च्यवनप्राश तक भी खा ला बाकिर दिनों-दिन सुखाइल जातबा। चल दूनों के देखवा देब।
लटकू- कहत बाड़ऽ तब चलले न जाई। हमार पतोहिया भी हरदम बीमारे रहेली। जब ओकरा के भगवान बुझलन, आ कचगराहें में दोगो वाल-बच्चा भइलनसन, कहेली कि सुपली में लहर फेंकला, चलला पर अन्हार हो जाला, चक्कर मारेला। हमरा पास पइसा नइखे। ओकरा से कहीला कि प्रसूत भइल होई, रोज सतावर के छाल गरम दूध में पीअल करऽ, कबहूँ-कबहूँ पीअत भी देखींला, बाकी मिजाज अबहीं कसर-मसर हइले हइख। स्वास्थ्य मेला में देखावल ठीक रही। बाकी बड़ा लजपोकड़ पतोह बीआ। देखीं, कहला पर चलेली कि ना ? बुचीया के माई से कहब कि पतोह राम के साथ ले चलऽ, चली आ रोग अगर पहचान में आइल त फिर उनका छुटही के बा, ना होई तब भरम त फाट जाई।
भरेठ- सब केहू मन बना लेलख तब हमहीं पीछे काहे रहब। जरूर स्वस्थ्य यौवन मेला जाइब, घरवाली के भी साथ लेते चलब। हमार वाली अभी बड़ा टागर बीआ। तनिका भर टिटकारी मारब कि उ दुलकत पहुँच जाई, बाकी हमार एगो दोसर फेरा बा। ई छोटे-छोटे लड़िकवन के का कइल जायी, बीना गोइले उ मानवे ना करीहनस। राह चलते आपस में टाना-टुनी करे लगीहनस। अगर चल जइहन सन त खखुअइले जलेबी देखते दूकान पर टुट पड़ीहनस। एनहीं से चेट कुछ गरमा के राखे के पड़ी। मेला से लवटे के बेरी के फेरा भी कम ना होई। मालकीनिया फरमाई की एनही से दो पोथा टिकुली आ लकमें के काजल लेते चले के। अब केहु बतावे, सरकार भले स्वस्थ यौवन मेला में पइसा मत ले, मुफ्ते में सेवा करे, तबो कुछ ना कुछ हमार पाकेट से झरइबे नू करी।
बहोरन- देखऽ अब इनकर तनिका बोली, अरे हमार घरवाली टिटकारी पर चउकत रहीत, तब ओकरा के आजे लटका-झबीआ सेगाथ देंती, बाकी बीमार बीआ। कभी-कभी गोड़ में पायल पेन्ह लीही, तब ओकरा झनझनाहट से कहेले की महमन्ड फाटे लागेला। ठोर रंगल त देखलहीं नइखी। गोड़ त पुजा-पाठ के बेरी नउनीये कभी रंग दे ले।
लटकू- तब ल, बचाव पइसा ।
बहोरन- बचत कहाँ बा हो, सब कमाई ओकर बीमारी में भसम होखल जात बा ।
भरेठ – अच्छा घबड़ाये के ना भाई, सुख-दुख त पड़ते रहेला ।
प्रकाश – ठठपाल ! तू त जरूर चलबऽ, चलीहऽ, जाँच करावल ठीक ह। रोग ना रही तब मन भीतर से जोमगर हो जाला। अगर लोग नीरोग रही तब राष्ट्र भी सबल हो जाला। तब ठठपाल अइसन ढेर जवान राष्ट्र प्रहरी बने खातीर तैयार हो जइहें। फिर अगर कवनो नापाक आँख गुड़ेरी त ओकर आँख निकालत थोड़े देर लागी। कौनों लश्कर-जैसे के भुभना फोड़त देर ना लागी, आ अंगुरिया पर नचा के फेंकल खेल अइसन बुझाई । मारीच आउर सुबाहू के का हाल भइल रहे, ओसहीं आतंकवादीन के होई।
भरेठ- सुनऽ ए प्रकाश भाई, तू ठठपाल के का समझईबऽ! इनका में त राष्ट्रीयता अपने उफनाता। हमनी के पहिले आपन घरवा त सम्हाल के राखे सीखींजा। पहिले दंगा फसाद के काबू में राखे पड़ी। ठठपाल त जईहें सीमा पर लड़े, घर के ठीक-ठाक त हमनीयें के राखे के पड़ी। दंगाई बेसहारा, बेगुनाह औरतन के ईज्जत लूट के आग में झकोरदेलसन। एड्स से डर कहाँ लागेला ओह सब के। गुप्त रोग त अलगे बा, दंगा-फसाद से देश में वैमनस्यता के बीमारी, महामारी अइसन फैले लागेला। एही से देश कमजोर होला। दुश्मन के नजर, अन्दर के कमजोरी पर लागल रहेला। उ कबहुँ संसद पर हमला करेला त कबह कालूचक, कबहू कासीम नगर मे नर संहार कर बइठला। अक्षर धाम आउर रघुनाथ मंदिर भी चपेटाइल रहेला। हमनी के देखे के पड़ी कि ना केहू रेल के बोगी में आग लगा के सवारी के होरहा अस भूजें, ना कवनो न्यूटनवादी गली-कुचा में जला-जला के देश के मरघट में बदले। अगर सब केहू राहत शिविर में हीं रहे खातीर लाचार हो जाई त, उत्पाद ठप होजायी, देश कंगाली के तरफ बढ़े लागी। पूंजी विनिवेश से विदेशी मुद्रा बढ़ावल पर भी अन्तोदय ना हो पायी। एह सब पर कड़ा नजर राखे के पड़ी। आपन बलबूता लगावें के पड़ी। आमेजन नदी के पानी से भारतभूमि के सिंचाई ना हो पायी, पैदा ना बढ़ पायी, एकरा खातीर, गंगा-यमुना, कृष्णा-कावेरी, रावी-सतलज, सोन-ब्रह्मपुत्र के पानी से पटवन करे के पड़ी। जब ई सब होई तब ठठपाल सीमा पर चौकसी रखीहें, आउर भाई हमीद आउर अल्बर्ट एक्का अइसन बन के राष्ट्र के सम्मान बढ़ा पईहें।
ठठपाल- काका, तोहार बात से अइसन जोश जागता कि अबहींये एके छलांग में समुद्र पार कर जाइब। ठीक बा हमहूँ मेला में जाके जाँच करवा लेत बानी, बाकी दादाजी वाला नुस्खा-लंगौटा टाइट रखे वाला ना भूलाइव। लागत बा कि ई नुस्खा अंजनी के लाल से चलल आवत होई, तब त उ शक्ति के पुंज हवन, एके बे में समुंदर लाँघ गोइलन, सीता जी के सुधिओ लगा लेलन आ लंका दहन करके रघुवर के साथे आपन सिक्का भी जमा देलन।
प्रकाश- सुरक्षित यौन के जगह, गलत यौन संबंध के एकदमे खारिज करे के चिन्तून होखे के चाहीं।
बात ठीक बा की लंगोट टाइट करके राखे के चाहीं, लेकिन आज भूमंडलीकरण के जमाना बा, विश्व एगो गाँव के रूप ले रहल बा, आपन-आपन सभ्यता संस्कृति के बचावल मुश्किल हो रहल बा, मुफ्त व्यापार के जरिए सब कुछ घाल-मेल हो रहल बा, पूँजी विनिवेश के नाम पर सब कुछ बेचाइल जात बा विदेशी कम्पनी धीरे-धीरे घुसल आवता। एह हालात में गुप्त रोग (एड्स) भी एक जगह गेरूड़ मरले ना नू रह जायी। एही से स्वस्थ यौवन मेला के उपयोग बनल जाता। हम कबहूँ कहाँ कहली हाँ कि देश के लोग हनुमान, अंगद, भीम, कर्ण, एकलव्य, हमीद, अलबर्ट एक्का अइसन वीर मत पैदा होखस। तूहू बनऽतब देश के धरोहर बन जइब।
ठठपाल- अबके हमरा मन लायक बात भइलऽ /अब हमहूँ सुरक्षा
प्रहरी बन के संसद पर पहरा देब। जे.पी. यादव आ नेगी अइसन कुर्बानी देबे के पड़ी तबो ई पैर अंगद के पैर अइसन ना टकसी। हमार बहिनियों कमलेशवा का पीछे हटल, उहो जान पर खेल गोइल, लेकिन देश के सम्मान ना नू जाये देलख। अबकी हमहूँ कुछ करके देखइबे करब। हमत पहिलहीं आतंकवदीयन के धर दबोचब। जरूरत पड़ीतऽ कश्मीर के सीमा रेखा पर भी पहरा देब, फिर कवनो दुश्मन का एने टपहू पइहें। अबकी तनिको मरउवत ना होखी, ना छोड़ले जइहन जा। हमार सरिता आउर चाँदनी दोनों बहिनिया भी देश खातीर लड़े के वास्ते बौखलाइल बाड़ीसन। सुनऽ उहनीं के ललकार- कारगिल के दुश्मन, लाल किला के आतंकी के अबकीना छोड़े के,अइसन पाठ पढ़ाइब, आवे याद छट्ठी के दूध, अबकी ना छोड़े के, संसद पर हमला जे कइले, पहिले, लक्ष्मण रेखा ए तूड़ले बा, हर जवान हनुमान बा एने, हर जवान अंगद बा।
हर किसान, हर मजदूर, बा एने जामवन्त, नल-नील, रहीह अटल, अटल जी अब की, मत दीह तू ढील।
तनीको ढील अगर तू देलऽ देश के देवे पड़ी जवाब; गलती भइल, अवसर पर चूकली (संसद हमला पर), इ ना सुनी केहू जवाब।
बहोरन- भरेठ भाई। ठठपाल बेटा खाली बेटा ना ह, हीरा ह हीरा। एक दिन गाँव-जवार का सउसे देश के नाम रोशन करी। एकर’ जइसन लगन बा, उमंग बा, सूझ-बूझ बा, बोले बतिआवे के हुनर बा सबसे बढ़ के देश भक्ति से मातल बा, अइसने लोग पर देश के नाज रहेला। नन्हेंपन से होनहार लागत रहे। ओह समय के एकर एगो बात इयाद आवेला, जब चरवाही में हमेशा कहत रहे-
सात भैंस के सात चभाका,
सवा सेर घीव खाव रे,
केने बाड़े तोर बाघ मामा
एक तक्कड़ लड़ जाव रे।
प्रकाश- अच्छा अब हमनी के “स्वस्थ यौवन मेला” देखला के बाद फिर से मिलब जा।
सब केहू मिलके गीत गावत जाता-
जे.पी. यादव कमलेश कुमारी, नेगी अइसन, देश के बेटा-बेटी चाही,अंतिम साँस तक हाथ में तिरंगा,
जय हिन्द के बोली चाहीं।
भारत माता की जय, भारत माता की जय, भरत माता की जय

