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शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में डिजिटल युग की हिंदी लघुकथा पर व्यापक विमर्श।

कोलकाता/पश्चिम बंगाल (मनोज कुमार प्रसाद)19 मई। शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा ‘डिजिटल युग में हिंदी लघुकथा : संवेदना से स्क्रीन तक की यात्रा’ विषय पर राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े साहित्यकारों, शोधार्थियों, शिक्षकों और साहित्यप्रेमियों ने भाग लेकर समकालीन हिंदी लघुकथा की दिशा, चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर विचार-विमर्श किया।

कार्यक्रम की संचालिका गायत्री उपाध्याय ने स्वागत वक्तव्य में कहा कि शब्दभूमि प्रकाशन केवल पुस्तकों के प्रकाशन तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्यिक संवाद, सांस्कृतिक विमर्श और सामाजिक चेतना के विस्तार का भी सक्रिय माध्यम है। उन्होंने कहा कि डिजिटल मंचों ने हिंदी साहित्य, विशेषकर लघुकथा को नए पाठक, नई अभिव्यक्ति और व्यापक पहुंच प्रदान की है।

संगोष्ठी में शोधार्थी संजय शाह ने ‘हिंदी और बांग्ला कहानियों में स्त्री चेतना’ विषय पर वक्तव्य देते हुए महादेवी वर्मा, कृष्णा सोबती, मनु भंडारी, आशापूर्णा देवी और महाश्वेता देवी की रचनाओं के माध्यम से स्त्री प्रतिरोध और स्वतंत्र चेतना के स्वर को रेखांकित किया।

मुकेश राम ने ‘सोशल मीडिया और लघुकथा : अवसर या चुनौती’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने नए लेखकों को मंच प्रदान किया है और हिंदी साहित्य को वैश्विक पाठक वर्ग तक पहुंचाया है। साथ ही उन्होंने साहित्यिक चोरी, सतही लेखन तथा ‘लाइक-फॉलोअर्स’ संस्कृति को गंभीर चुनौती बताते हुए साहित्यिक मूल्यों की रक्षा पर बल दिया।

डॉ. आशीष कुमारी कांता ने ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता और लघुकथा की रचनात्मकता’ विषय पर कहा कि एआई कथाकार को प्लॉट, चरित्र और कथानक निर्माण में सहायता कर सकता है, किंतु कहानी की भावनात्मक गहराई और मानवीय संवेदना अब भी मनुष्य की रचनात्मक चेतना से ही संभव है। उन्होंने एआई को साहित्यकार का सहायक उपकरण बताते हुए उसके विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।

राजीव रंजन ने डिजिटल माध्यमों के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों पर चर्चा करते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने शिक्षा, व्यापार और सामाजिक जागरूकता को नई गति दी है, लेकिन फेक न्यूज़, साइबर बुलिंग और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं। उन्होंने संतुलित और जिम्मेदार उपयोग की आवश्यकता बताई।

राजस्थान से जुड़े मुन्नाराम मेघवाल ने सोशल मीडिया को चुनौती से अधिक अवसर बताते हुए कहा कि साहित्य सामाजिक और तकनीकी परिवर्तनों से अछूता नहीं रह सकता। वहीं केरल से जुड़ी मिथिला पी. नायर ने डिजिटल माध्यमों पर लघुकथा के बदलते स्वरूप पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि ब्लॉग, ई-पत्रिकाएं, सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और वीडियो मंचों ने लघुकथा को वैश्विक पहचान दिलाई है।

तमिलनाडु से डॉ. वी. मल्लिका ने हिंदी लघुकथा में एआई के प्रयोग और महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता लेखन प्रक्रिया को गति देती है तथा अनुवाद और संपादन में भी सहायक सिद्ध हो रही है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि कहानी की आत्मा और मानवीय अनुभव का स्थान कोई तकनीक नहीं ले सकती।
महाराष्ट्र से राहुल भिवा हातागले ने ‘परंपरा से प्रयोग तक : हिंदी लघुकथा की संभावनाएं’ विषय पर अपने विचार रखे। तकनीकी व्यवधान के कारण उनका वक्तव्य पूर्ण रूप से श्रोताओं तक नहीं पहुंच सका। छत्तीसगढ़ से जुड़ी शांति सोनी ने लघुकथा को सामाजिक न्याय और हाशिए के समुदायों की अभिव्यक्ति का प्रभावशाली माध्यम बताया।
राजेश देहाती ने डिजिटल दौर में साहित्य और लोक संवेदना के संबंध पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने गांव, कस्बों और आम जनजीवन से जुड़े अनुभवों को साहित्य के केंद्र में लाने का कार्य किया है।
संगोष्ठी के दौरान कुछ प्रतिभागियों ने तकनीकी समस्याओं और विषय की पूर्व सूचना न मिलने का मुद्दा भी उठाया। डॉ. तुहिना प्रकाश शर्मा ने सुझाव दिया कि भविष्य में वक्ताओं को विषय पहले से उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे बेहतर तैयारी के साथ सहभागिता कर सकें। आयोजकों ने इस सुझाव का स्वागत किया।
कार्यक्रम में डॉ. मिनाक्षी सोनवणे, मुकेश राम, संजय शाह, डॉ. आशिष कुमारी कांता, डॉ. बी. मल्लिका, आशीष अम्बर, डॉ. तुहिना प्रकाश शर्मा, शांति सोनी, राजीव रंजन, मुन्ना राम मेघवाल, मिथिला पी. नायर, राहुल भिवा हातागले तथा सुषमा शुक्ला सहित अनेक प्रतिभागियों की सक्रिय सहभागिता रही।
संगोष्ठी के आयोजन एवं संचालन में संयोजक मंडल की सक्रिय भूमिका उल्लेखनीय रही। आयोजन समिति में प्रिया श्रीवास्तव, प्रिया पाण्डेय ‘रोशनी’, श्रद्धा गुप्ता ‘केशरी’, नूपुर श्रीवास्तव, निधि कुमारी सिंह तथा गायत्री उपाध्याय शामिल रहीं।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन निधि गुप्ता द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने देशभर से जुड़े वक्ताओं, शोधार्थियों, श्रोताओं और साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हिंदी लघुकथा और डिजिटल साहित्य के इस संवाद को निरंतर आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

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