
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)31 दिसंबर।प्रतिवर्ष की भांति इस बार भी नव वर्ष पर हजारों श्रद्धालुओं का भीड़ मां के दर्शन के लिए मंदिर प्रांगण में उपस्थित होगा। जिसको देखते हुए मंदिर ट्रस्ट समिति ने सभी परेशानियों पर बारीकी से दूर करने हेतु प्रयासरत है। श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद फल फूल इत्यादि की पूरी व्यवस्था है ।मंदिर को आकर्षक ढंग से सजाया जा रहा है। लाइट की व्यवस्था की गई है ।निशुल्क प्रसाद वितरण होते रहेगा। श्रद्धालुओं को दान देने के लिए अतिरिक्त काउंटर बनाए गए हैं।
मां आरण्य देवी का मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है जिसमें राजा मोरध्वज ,पांचो पांडवो का अज्ञातवास से जुड़ी ऐतिहासिक गाथाएं हैं।
मां आरण्य देवी मंदिर में स्थापित बड़ी प्रतिमा को जहां सरस्वती का रूप माना जाता है, वहीं छोटी प्रतिमा को महालक्ष्मी का रूप माना जाता है। इस मंदिर में वर्ष 1953 में श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुध्न व हनुमान जी के अलावे अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित की गयी थी। बताया जाता है कि उक्त स्थल पर प्राचीन काल में सिर्फ आदिशक्ति की प्रतिमा थी। इस मंदिर के चारों ओर वन था। पांडव वनवास के क्रम में आरा में ठहरे थे। पांडवों ने आदिशक्ति की पूजा-अर्चना की। मां ने युधिष्ठिर को स्वपन् में संकेत दिया कि वह आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित करे। धर्मराज युधिष्ठिर ने मां आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित की। कहा जाता है कि भगवान राम जी, लक्ष्मण जी और विश्वामित्र जी जब बक्सर से जनकपुर धनुष यज्ञ के लिए जा रहे थे तो आरण्य देवी की पूजा-अर्चना की। तदोपरांत सोनभद्र नदी को पार किये थे।
गठित मंदिर ट्रस्ट समिति की ओर से मीडिया प्रभारी कृष्ण कुमार ने बताया की 155 फीट ऊंचा बना रहा है माता का मंदिर। अभी भी निर्माण कार्य चल रहा है। मंदिर अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस होगा। छह मंजिले नये मंदिर में अन्य देवी देवताओं की मूर्ति स्थापित होगी। निर्माणाधीन मंदिर के चार फ्लोर की ढलाई हो चुकी है। पांचवे फ्लोर पर सेंटरिंग का कार्य जारी है। आने वाले समय में मंदिर अपने भव्य रुप में दिखेगा।
