
शाहपुर/भोजपुर (राकेश मंगल सिन्हा) 22 नवम्बर। भोजपुर जिला के शाहपुर प्रखंड क्षेत्र के धमवल गाँव मे प्रवचन करते हुए श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि अपने लिए सुख की इच्छा करना ही दुख का कारण है। जितना ही हम सुख सुविधा में रहना चाहेंगे उतना ही संसार में परेशानियां पैदा होंगी और उतना ही कष्ट होगा। इसलिए सुख पाने के लिए अपने सुख की इच्छा का त्याग करना चाहिए। सुख की इच्छा, आशा और भोग तीनों संपूर्ण दुखों के कारण हैं। ऐसा होना चाहिए और ऐसा नहीं होना चाहिए, इसी में सब दुख भरे हुए हैं। मन में किसी वस्तु की चाह रखना ही दरिद्रता है। लेने की इच्छा वाला सदा दरिद्र ही रहता है। मनुष्य को कर्मों का त्याग नहीं करना है प्रतीत कामना का त्याग करना है। मनुष्य को वस्तु गुलाम नहीं बनाती बल्कि उसकी इच्छा उसको गुलाम बनाती है। स्वामी जी ने कहा कि यदि शांति चाहते हो तो कामना का त्याग करो। कुछ भी लेने की इच्छा भयंकर दुख देने वाली है। जिसके भीतर इच्छा है उसको किसी न किसी के पराधीन होना ही पड़ेगा। अपने लिए सुख चाहना राक्षसी प्रवृति है। संग्रह की इच्छा पाप करने के सिवाय और कुछ नहीं कराती। अतः इस इच्छा का त्याग कर देना चाहिए। कामना का त्याग कर दें तो आवश्यक वस्तुएं स्वतः प्राप्त होंगी। निष्काम मनुष्य के पास आने के लिए वस्तुएं लालायित रहती हैं। जो अपने सुख के लिए वस्तुओं की इच्छा करता है उसको वस्तुओं के अभाव का दुख भोगना ही पड़ेगा। स्वामी जी ने कहा कि सबसे बङा विपत्ति वह है जिसमें हम परमात्मा को भूल जायॅ। विपत्ति को विपत्ति नही, संपत्ति को संपत्ति नही समझना चाहिए। हमारे पास जो विपत्ति आती है तो महापुरूष लोग यह मानते हैं कि जो मैने किया था उसका मार्जन हो गया। ऐश्वर्य इत्यादि आया तो यह मानते हैं कि सुकृत कर्म कम हो गया। सबसे बङा विपत्ति वह है जिसमें हम परमात्मा को भूल जाएं। उनके संदेश को भूल जाएं। जिस विपत्ति में हमारे घर,परिवार में रहन-सहन, उठन-बैठन, बोल चाल, खान पान सब बिगड़ जाय तो समझना चाहिए सबसे बड़ा विपत्ति यही है। इस विपत्ति का समाधान एक मात्र विनाश है। सर्वनाश के अलावा कोई दूसरा उपाय नही है। जहाँ भगवान नारायण की स्मृति हो जाय। जिसने संकल्प ले लिया कि चोरी, बेईमानी, अनीति, अन्याय , कुकर्म, अधर्म नही करूंगा सबसे बड़ा श्रेष्ठ कर्म वही है। वह व्यक्ति या परिवार भविष्य मे ऊँचाई पर चढ़ेगा। 
