
पटना/बिहार (राकेश मंगल सिन्हा) 07 नवम्बर। कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि को लोकआस्था एवं सूर्योपासना के महापर्व छठ का पहला अर्घ्य संपन्न हो गया। छठ पर्व की शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय के साथ शुरू हुई। इस दिन छठव्रतियों ने शुद्धता से नहा धोकर अरवा चावल, चना का दाल और लौकी की सब्जी खाया तथा परिजनों सहित रिश्तेदारों एवं मित्रों को प्रसाद खिलाया। कार्तिक शुक्ल पंचमी तिथि को छठव्रतियों ने खरना व्रत रखा। पूरे दिन व्रत रहकर छठव्रतियों ने सूर्यास्त के समय छठ मैया की पूजा करके गुङ का खीर और रोटी का प्रसाद चढ़ाया तथा ग्रहण किया और लोगों को खिलाया। कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को पूरे दिन निर्जला उपवास रहकर छठव्रतियों ने अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य अर्पित किया। गंगा नदी सहित अन्य नदियों, आहर, पोखर, तालाब तथा घरों मे गंगाजल तथा पानी भरे कृत्रिम तालाब या हौदा में खड़ा होकर छठव्रतियों ने सूप में ठेकुआ, नारियल, घाघर नींबू, सेब, संतरा सहित अन्य फल लेकर अर्घ्य दिया। छठव्रतियों ने शुद्धता से गेहूँ को धोकर, सुखाकर एवं धुले हुए चक्की मे आटा पिसवा कर शुद्ध घी से बने विशेष पकवान ठेकुआ, तरह-तरह के फल और जलते दीया को बांस या पीतल के सूप अथवा पीतल के थाली में रखकर और पानी में खड़ा होकर अस्त होते भगवान भास्कर को अर्घ्य दिया।
उगते सूर्य की पूजा तो सभी करते हैं। उगते सूर्य या उगते शक्ति की पूजा करने का संसार का विधान है। लोग भी उगते सूर्य और उदित होते शक्ति को ही पूजते हैं। लेकिन हिंदू धर्म मे अस्त होते सूर्य की आराधना का भी विधान है। सूर्योपासना का महापर्व छठ इसका जीता जागता उदाहरण है। लोकआस्था और सूर्योपासना के महापर्व छठ के अवसर पर पहले दिन छठव्रती डूबते सूर्य की आराधना करते हैं और अर्घ्य अर्पण करते हैं। दूसरे दिन छठव्रती उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। “उदय” का “अस्त” सांसारिक नियम है तो वहीं दूसरी तरफ “अस्त” का “उदय” भी प्राकृतिक और आध्यात्मिक सत्य है। प्रकृति एवं ऊर्जा के अक्षय स्त्रोत की पूजा और आराधना केवल हिंदू धर्म में ही होती है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को छठव्रतियों ने ऊर्जा के इस अक्षुण्ण स्त्रोत भगवान भास्कर के अस्त होते स्वरूप गोधूलि के रक्तिम रवि की पूजा अर्चना की एवं अर्घ्य दिया।

