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विद्या और विधा में सामंजस्य स्थापित करना हमारा दायित्व : बक्शी विकास

RKTV NEWS/बक्शी विकास,26 मार्च।आज की पीढ़ी बहुत जागरूक है, उसे हर उस बात का तर्कपूर्ण उत्तर चाहिए जहां उसे तथ्यों को स्वीकार्य करने में हिचक हैं। आज की पीढ़ी को संतुष्ट करना हमारा दायित्व भी हैं। कल एक चर्चा में मेरी ही एक शिष्या ने कहा कि कथक में चक्कर और तैयारी वाले स्टाइल को नाचने से पॉपुलरिटी मिलती हैं। लोगों की तालियां मिलती हैं। यह कथन सत्य भी हैं। किन्तु बच्ची की अज्ञानता में और आधुनिक युग के प्रभाव से निकली इस बात में हमारे कथक के उद्भव और विकास, कलाकारों के नित नए प्रयोग और परंपरा पर एक बड़ा सवाल हैं?और कुछ गहरी बातें भी। यह तो बिल्कुल सत्य है कि उत्तर भारत में समय काल खंड के अनुरूप कला पर भी प्रभाव पड़ता रहा। लिहाजा कुछ बहुत खूबसूरत शैलियों का सृजन हुआ किन्तु परम्परागत शैलियों को नुकसान भी हुआ। कुछ लोग कहते हैं और किसी हद तक मेरा भी ऐसा मानना है कि शास्त्रीय संगीत नृत्य के साथ सबसे ज्यादा छेड़छाड़ उत्तर भारत में ही हुआ है। ध्रुपद की गायकी से ख्याल तथा ठुमरी, दादरा व अन्य गायन शैलियों का विकास होना सुखद हैं किन्तु आधुनिक युग में अब ध्रुवपद और ख्याल से ज्यादा ठुमरी सुनने में अभिरुचि रखते हैं वो भी विलंबित की नहीं तेज गति वाली। और गति ने आज सबकी मती मार रखी है। पूरी दुनिया द्रुत गति में हैं।ऐसे में मौलिक कलाओं की परंपरागत शैलियों को बचाना एक बड़ी चुनौती है। खैर यह एक बहुत गहरा और चिंतन मनन का विषय है।जिसे चंद शब्दों में नहीं समेटा जा सकता। मैं, मेरी शिष्या की दुविधा को दूर करने के लिए कथक की थोड़ी व्याख्या के साथ साथ कुछ उदाहरण प्रस्तुत करता हूं। किसी महानगर में शाम को सड़कों पर दौड़ती हजारों लाखों गाड़ियों की टिमटिमाती लाइटों को देखे तो आंखे चोंधियाने लगती हैं। आज ऐसे ही स्थिति हमारी कलाओं में पनपती शैलियों की है। हर कोई अपने उटपटांग प्रयोगों को स्थापित करने में लगा हैं। नित नये प्रयोग करने में कोई हर्ज नहीं है किन्तु परंपरा को तोड़कर नहीं। आधुनिक कथक की स्थिति के ऊपर नृत्य सम्राट पदमविभूषण पंडित बिरजू महाराज जी कहते हैं कि चक्कर पे चक्कर और उछल कूद तो सर्कस वाले भी दिखाते हैं फिर कथक जैसी वर्षों की प्राचीनतम शैली को सर्कस बनाना कहा तक उचित है। हालांकि तेज गति और चक्कर पे चक्कर काटना आसान भी नहीं है, रियाज और अभायास की चीज है। बड़े बुजुर्गो ने कथक प्रदर्शन के क्रम को बड़े शोध और विमर्श से तैयार किया है। जिसमें कथक के उद्भव और विकास का परिदृश्य प्रदर्शित होता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत शुरू से ईश्वर की भक्ति का मार्ग रहा हैं। एक बड़ी चर्चित फिल्म का गीत है ” पग घुंघरू बांध मीरा नाची री” मुझे लगता है इतना तो सभी जानते हैं कि मीरा कृष्ण की सबसे बड़ी भक्त थी। अब मीरा ने चक्कर पे चक्कर मारा होगा या खूब लय तैयारी दिखाई होगी कृष्ण को ।इसका अंदाजा आप लगा लीजिएगा। पर मुझे लगता है कि मीरा से ज्यादा लोकप्रिय आज भी कोई नहीं है। तात्पर्य यह है कि कथक पूर्ण रूप से कृष्ण के समान है। कथक के आगे भी ‘क’ हैं और पीछे भी ‘क’ है तथा बीच में ‘थ’ हैं। अर्थात कृष्ण से आरंभ होकर कृष्ण में समाहित होने वाला यह थिरकन ही तो कथक हैं। कथक के बोल को यदि आम व्यक्ति भी बोलेगा तो कहता है कि “तिगधादिगदिग थेईतिगधादिगदिग थेईतिगधादिगदिग थेई” इस बोल में मुझे तीन चक्कर से ज्यादा का स्कोप नजर नहीं आता। आप 10-20 मार लीजिए, आप सक्षम भी हैं, आखिर जीवन भर आपने चक्कर ही तो काटा हैं। जहां लय और तैयारी की बात हैं, तो एक प्रश्न मेरे मन को बार बार झकझोरता है कि लय और तैयारी क्या बिना भाव भंगिमाओं के प्रदर्शित हो तो उसे सुनकर आनंद लेना या देखकर? यदि देखकर आनंदित होना हैं तो मेरी समझ में वो लय और तैयारी केवल पैरो से नहीं अपितु पूरे शरीर के अंग उपांग को सम्मिलित करके प्रदर्शित करना उचित होगा। अगर शिव को शिव न बता सके कृष्ण को कृष्ण न बता सके, राधा की झलक न दिखा सके तो इन सब के बिना कथक को कैसे निभा पाएंगे। कथक की सिर्फ एक ही व्याख्या है “कथा कहे सो कथक कहावे”। कथक के उद्भव को अध्यन करोगे तो अनुभव करोगे कि कथक में कथा की ही अभिव्यक्ति होती थी और बीच बीच में बहुत थोड़ा सा घुंघरुओं से लय इत्यादि प्रदर्शित करते थे। आज ठीक इसका उलटा हो गया है। लय और तैयारी आधुनिक कथक का एक छोटा सा पार्ट हो सकता है, पूरा कथक नहीं। लय और तैयारी पर आधारित नृत्य को शास्त्रीय नृत्य कह सकते हैं किन्तु कथक तो बिल्कुल नहीं।अत: पूर्ण रूप से कथक करने के लिए हर पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक हैं। इन्हीं बातों पर जब पंडित बिरजू महाराज ने सबकी दृष्टि खोली तो कथक के भगवान के रूप स्थापित हो गए। और कोई भी काला चश्मा , मुकाबला मुकाबला और कथक में सर्कस दिखाने वाले की पॉपुलरिटी कृष्ण भक्त महाराज जी और मीरा जितनी नहीं हो सकती। अंत में इतना कहूंगा कि स्वयं को गुनी, विद्वान बताने के लिए आप कितने ही प्रयास करें किन्तु मौलिक कलाओं की समृद्ध पृष्ठभूमि को धूमिल करने का प्रयास अनुचित हैं। लिहाजा ‘विद्या’ और ‘विधा’ के फर्क को समझना और दोनों में सामंजस्य स्थापित करके रखना भी हमारा दायित्व हैं।

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