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वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 को रद्द करो: लोकतांत्रिक जन पहल

RKTV NEWS/पटना(बिहार)18 अगस्त। संसद में पेश और संयुक्त संसदीय समिति के हवाले किया गया वक्फ संशोधन बिल 2024 में सुझाये गये अधिकतर सुझाव वक्फ संपत्ति पर सरकार के कब्जे को मजबूत कर समुदाय व वक्फ बोर्ड के अधिकारों को लगभग समाप्त करने वाला है। यह बिल वास्तव में मोदी सरकार का एक और अल्पसंख्यक विरोधी कदम है जिसका हर लोकतांत्रिक-सेक्यूलर पार्टी और व्यक्ति को विरोध करना चाहिए। लोकतांत्रिक जन पहल इस बिल को रद्द करने की मांग करता है।
लोकतांत्रिक जन पहल ने जेडीयू के द्वारा बिल का समर्थन करने के मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के रवैए की कड़ी भर्त्सना करते हुए कहा है कि नीतीश कुमार ने कभी भी संसद के अंद‌र और बाहर भाजपा के साम्प्रदायिक हमलों का विरोध नहीं किया है। नागरिकता संशोधन बिल‌ के समय भी वो भाजपा के सामने नतमस्तक थे।
वक्फ एवं भूमि क़ानून के विशेषज्ञ जनाब अब्दुल वहाब अंसारी ने कहा कि हमारा यह मानना है कि वक्फ ऐक्ट 1995 वक्फ की संपत्ति की सुरक्षा और संरक्षा के लिए जरूरी है और उसके प्रावधानों को लागू करने की जरूरत है। ऐसा न कर मोदी सरकार संशोधन बिल से वक्फ ऐक्ट 1995 के तहत प्रदत्त वक्फ बोर्ड के अधिकारों को हड़पना चाहती है।
प्रो मुज्तबा हुसैन ने कहा कि बिल को ध्यान से देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि संशोधन विधेयक वक्फ के मामले में ट्रिब्यूनल को वस्तुतः निष्प्रभावी कर ‘कलेक्टर राज‘ स्थापित करने वाला है। इसमें कलेक्टर को असीमित अधिकार दिये गये हैं । दूसरी बात यह है कि कलेक्टर राजनीतिक प्रभाव के तहत काम करते हैं, ऐसे में उनसे विशेषकर उन वक्फ संपत्तियों के बारे में निष्पक्षता की उम्मीद नहीं की जा सकती जिस पर मोदी सरकार के कब्जे की नजर‌ हैै।
ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार द्वारा वक्फ अधिनियम, 1995 में प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों की स्वायत्तता को कम करना है।
सत्य नारायण मदन ने कहा कि हमारा मानना है कि संविधान अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी विरासत और धार्मिक प्रथाओं का संचालन और संरक्षण करने की अनुमति देता है। ऐसा लगता है कि इस विधेयक को इसके प्रमुख हितधारकों के साथ बिना ठोस विमर्श के बिना ही तैयार किया गया है।
याद रखने की बात है कि वर्तमान कानून के तहत, वक्फ संपत्ति से संबंधित किसी भी विवाद का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जाना चाहिए, लेकिन संशोधन से यह अवधि बढ़ जाएगी, जिससे भ्रम और कानूनी विवाद पैदा होंगे।
हमारा मानना है कि यदि वक्फ के विशेषज्ञों के साथ कोई वास्तविक परामर्श किया गया होता, तो यह स्पष्ट हो जाता कि वक्फ को पुनर्परिभाषित करना विधायी क्षेत्राधिकार के बाहर है।
हमने देखा है कि मीडिया में यह दुष्प्रचार किया गया कि वक्फ बोर्ड अधिनियम अन्य धार्मिक समुदायों की भूमि हड़पता है। ऐसे दावे मनगढ़ंत और निराधार हैं। याद रखने की बात है कि वक्फ बोर्ड सरकार द्वारा अनुमोदित कानूनों के तहत काम करता है और सरकार द्वारा इसकी निगरानी की जाती है।
वक्फ संशोधन बिल राज्य सरकारों को वक्फ बोर्ड के सभी सदस्यों की नियुक्ति करने की अनुमति देता है, जिसमें गैर मुस्लिम समुदायों से कम से कम दो सदस्यों होंगे। यह बेमानी है और इससे मौजूदा सरकार के द्वारा साजिश की बू आती है।
यह बिल सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल में मुस्लिम सांसदों, न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं की आवश्यकता को कमजोर करता है।
समागम का संचालन लोकतांत्रिक जन पहल के संयोजक सत्य नारायण मदन ने किया। बोलने वाले प्रमुख लोगों के नाम है आलम हुसैन,एडवोकेट अशोक कुमार, कंचन बाला, ज़फ़र इमाम, कृष्ण मुरारी, रवीन्द्र सिंह, अशर्फी सदा और मुस्तफा राहत शामिल रहे।

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