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30 जुलाई 1923 : आध्यात्म, इतिहास, संस्कृत और परंपराओं के शोधकर्ता आचार्य गोविन्द चंद्र पाण्डेय का जन्म।

RKTV NEWS/रमेश शर्मा,30 जुलाई।भारत एक ओर भारतीय परंपराओं और संस्कृति के श्रेष्ठत्व को नष्ट करने और कूटरचित प्रसंगों से कलुषित करने का प्रपंच चला तो कुछ ऐसी विभूतियाँ भी हुईं जिन्होने अपना पूरा जीवन शोध अनुसंधान और अध्ययन में लगाकर सत्य को स्पष्ट करने का प्रयास किया । आचार्य गोविन्द चंद्र पाण्डेय ऐसी ही विभूति थे जिन्होंने आध्यात्म, भाषा और साहित्य का निरंतर अध्ययन और लेखन किया ।
ऐसी विलक्षण प्रतिभा के धनी आचार्य गोविन्द चन्द्र पाण्डे का जन्म 30 जुलाई 1923 को उत्तर प्रदेश प्राँत के प्रयागराज क्षेत्र अंतर्गत काशीपुर में हुआ । पूर्वज मूलतः अल्मोड़ा के रहने वाले थे । समय के साथ प्रयागराज आये । पिता पीताम्बर दत्त पाण्डे भारत सरकार की लेखासेवा में अधिकारी और संस्कृत के विद्वान थे । माता प्रभावती देवी भी भारतीय परंपराओं और मान्यताओं पर जीवन जीने वाली थीं। इस प्रकार परिवार में एक ओर समय की धारा के अनुरूप प्रगति करने और दूसरी ओर अपनी परंपराओ के अनुरूप जीवन जीने का वातावरण था । पिता ने बालक का नाम गोविन्द रखा और इसी वातावरण में बालक गोविन्द का बचपन बीता ।
गोविन्द चन्द्र पाण्डे बहुत कुशाग्र बुद्धि थे । उन्होनें काशीपुर के अपने विद्यालय में सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं । परिवार ने उनकी शिक्षा का प्रबंध दोनों प्रकार से किया था एक ओर समय की शिक्षा और दूसरी आचार्य रघुवीर दत्त शास्त्री और पण्डित रामशंकर द्विवेदी जैसे उद्भट विद्वानों से संस्कृत, व्याकरण, साहित्य एवं शास्त्रों के अध्ययन का प्रबंध किया।उच्च शिक्षा के लिये प्रयागराज आये और स्नातकोत्तर तक यहाँ भी सभी परीक्षाएँ सर्वोच्च्च अंकों से उत्तीर्ण कीं। साथ ही संस्कृत धर्म, दर्शन और इतिहास का अध्ययन भी निरंतर रहा । 1947 में उन्होंने ‘डी.फिल. उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अपने अध्ययन जीवन में ही पालि, प्राकृत. फ्रेंच, जर्मन और चीनी भाषाओं का भी अध्ययन किया ।
आगे चलकर अपने जीवन में इन्हीं विषयों को लेखन का केन्द्र बनाया । उनके द्वारा लिखे गये संस्कृति, दर्शन, साहित्य, इतिहास-विषयक अनेक आलोचनात्मक शोधग्रन्थ, काव्य-ग्रंथ और विविध शोधपूर्ण आलेख, भारत और विदेशों में सम्मानपूर्वक प्रकाशित हुये। संस्कृत में उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘दर्शन विमर्श:’ 1996 वाराणसी, ‘सौन्दर्य दर्शन विमर्श:’ 1996 वाराणसी, ‘एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति’ 1997 वाराणसी, ‘न्यायबिन्दु’ 1975 सारनाथ जयपुर आदि हैं। इसके अतिरिक्त संस्कृति एवं इतिहास विषयक पाँच ग्रन्थ और दर्शन विषय के आठ ग्रन्थों में ‘शंकराचार्य: विचार और सन्दर्भ‘ ग्रन्थ हैं। इनके अतिरिक्त साहित्यिक कृतियों में इनके द्वारा संस्कृत में रचित आठ अन्य ग्रन्थ और हैं।
आचार्य गोविन्द चन्द्र पाण्डेय के रचना संसार की विशेषता यह है कि इन्होंने किसी भी लेखन या धारा का खंडन अथवा तुलनात्मक विश्लेषण नहीं किया । केवल अपनी बात कही और संस्कृत साहित्य भाषा और वाड्मय की विशेषता स्थापित की । आचार्य गोविन्द चन्द्र पाण्डे ने ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं का हिन्दी काव्यानुवाद भी किया । दर्शन, इतिहास और संस्कृत में उनके ग्रंथ शोधार्थियों का आधार माने जाते हैं। वेद वाङ्मय पर उनका ग्रंथ ‘वैदिक संस्कृति’ भी एक धरोहर मानी जाती है ।
उनका अंतिम प्रमुख कार्य ऋग्वेद का हिंदी में अनुवाद और भाष्य था जिसके पहले खंड का लोकार्पण 2008 में नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में लोकभारती के दिनेश चंद्र ग्रोवर, सांसद मुरली मनोहर जोशी और कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी द्वारा किया गया था। वर्ष 2010 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया । इस प्रकार निरंतर शोध अनुसंधान और अध्ययन के लिये समर्पित यह विभूति 22 मई, 2011 को परम् ज्योति में विलीन हो गई ।

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