
RKTV NEWS/चतरा (झारखण्ड)06 जुलाई जिला खनिज निधि सह प्रशिक्षण भवन हॉल चतरा में अबुआ बीर दिशोम अभियान 2023 के तहत उपायुक्त श्री रमेश घोलप की अध्यक्षता में वन अधिकार अधिनियम 2006 से संबंधित कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला में सर्वप्रथम अतिथियों को पौधा भेंट कर स्वागत किया गया। तत्पश्चात दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।
उपायुक्त ने अपने संबोधन में सभी का आभार व्यवक्त करते हुए कहा कि माननीय मुख्यमंत्री झारखण्ड सरकार का महत्वकांक्षी अभियान अबुआ बीर अबुआ दिशोम अभियान है। जंगल में रहने वाले जो वन पर निर्भर है, जो लोग हकदार है, जानकारी के अभाव में वे वनपट्टा से वंचित रह जाते है। सभी लोगों को वनपट्टा अधिनियम 2006 से संबंधित जानकारी रहे इस उद्देश्य से कार्यशालय का आयोजन किया गया है। राज्य सरकार इस अभियान को लेकर गंभिर है, इसके लिए राज्य में भी विस्तृत जानकारी के लिए वर्कशॅाप भी कराया गया है। अधिकारियों को उन्होने कहा वनाधिकार पट्टा में अभियान चलाकर दावों की प्राप्ति एवं निष्पादन करें। वहीं राजस्व एवं वन विभाग के पदाधिकारी को अबुआ बीर दिशोम अभियान की सफलता के लिए ग्राम सभा/ग्राम वनाधिकार समितियों को सहयोग करने को कहा।
मूलभूत बातें
अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006, नियम 2008 व नियम 2012, को संक्षिप्त मेंवन अधिकार कानून, 2006 ( वन अधिकार अधिनियम-एफआरए, 2006) कहते हैं। यह कानून पूरे देश में हर प्रकार की वन भूमि पर लागू होता है।
इस कानून के मुख्यतः 2 उद्देश्य हैं–
वन पर आश्रित आदिवासियों तथा अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कब्जे की कृषि और आवासीय भूमि तथा कृषि आवासीय भूमि तथा कृषि संबंधित अनुषांगित क्रियाकलापों जैसे बथान (अस्थई रूप से जानवरों के रखने का स्थान), भीयारा (खलिहान), चक्रानुक्रम परती भूमि, वृक्ष उपज, और उत्पादन के भंडार के जमीन पर अधिकार मान्य करता है।
ग्रामसभा या ग्रामसभा समूहों को वन संबंधित उनके पारम्परिक रूप से उपभोग करते आ रहे सामुदायिक अधिकार और सामुदायिक वन संसाधन अधिकार मान्य करना शामिल है।
किसको अधिकार
वन में निवास करनेवाली अनुसूचित जनजाति वन में निवास करने वाले और प्राथमिक रूप से आजीविका के लिए वन भूमि पर निर्भर अनुसूचित जनजाति श्रेणी के सदस्य जो 13 दिसम्बर 2005 से पहले से प्राथमिक रूप से वन भूमि पर निवास करते हों (भीतर या बाहर) और अपनी आजीविका की वास्तविक जरूरतों के लिए वनया वन भूमि पर निर्भर हों।
अन्य परम्परागत वन निवासी
अनुसूचित जनजाति श्रेणी को छोड़कर अन्य सभी श्रेणी के सदस्य या समुदाय जो 13 दिसम्बर 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढ़ी (75 वर्ष) से प्राथमिक रूप से वन भूमि पर निवास (भीतर या बाहर) करते आ रहे हों और अपनी आजीविका की वास्तविक जरूरतों के लिए वनया वन भूमि पर निर्भर हैं। ध्यान रखें कि जमीन का कब्जा सिर्फ 13 दिसम्बर 2005 के पूर्व का होना चाहिए।
वन प्रमण्डल पदाधिकारी उत्तरी राहुल मीणा, वन प्रमण्डल पदाधिकारी दक्षिणी मुकेश कुमार, अप समाहर्ता अरविन्द कुमार, अनुमण्डल पदाधिकारी चतरा सुरेन्द्र उरांव, अनुमण्डल पदाधिकारी सिमरिया सन्नी राज, स्टेट रिसोर्स पर्सन एफआरए मनोहर चौहान, पीपीआईए फेलोस दीपक शर्मा, राजस्व, वन विभाग, कल्याण विभाग के पदाधिकारी, ग्रामसभा, ग्राम वनाधिकार समिति के सदस्य, बीर बंधु समेत अन्य उपस्थित थे।
