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रील्स की आभासी दुनिया का पैगाम क्या है???

RKTV NEWS/अजय कुमार गुप्ता “अज्ञानी”,26 जून।मोबाईलस और रिलस की दुनिया ने एक अलग मानवीय सभ्यता को जन्म दिया है। एक ऐसी आभासी दुनिया जिसकी ग्लैमर का सभी उम्र के नर नारी बड़े ही चटकारे के साथ मजे ले रहे है और सामाजिक ताने बाने को करीने से तार-तार कर रहे है। हद तो तब है जब हम इसमें नयापन देख रहे और उसे चाव से अंगीकार कर रहे है। एक ऐसी दुनिया का निर्माण हो चुका है जहाँ घर-घर में नायक नायिका का जन्म हो चुका है और सब आपने-अपने अभिनय में वक्त बेवक्त आकण्ठ डूबे हुए है। कोई किसी की प्रवाह नहीं करता शायदा वो रवायत अब बेमानी हो चुकी है। नेट और मोबाइल की दुनिया ने मानव वर्ग को चकाचौंध की अंधी दुनिया में ढकेल दिया है। जहाँ ना कोई जमीन शेष बची है ना कोई आधार सब अंधे, बहरे, गुंगे हो चुके है। नेट की दुनिया ऐसी मग्न कर चूँकि है कि ना कुछ सुनाई देता है ना कुछ दिखाई देता है। ना वो सही बोल सकने के हालत में बचा है। बस मोबाईलस स्क्रीन पर अंगद के पैरो सा नजर गड़ाए हुए है। देखना यह है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां कहाँ जायेगी कहाँ विराम होगा कुछ पता नहीं।
नेट ने हमारे जीवन को आसान तो बनाया है मगर उससे ज्यादा समाज को प्रभावित किया है जिसका परिणाम सुखद तो नहीं कहा जा सकता। मोबाईल में कुछ एक ऐसे फिचर है जो समाज के लिए जरूरी तो नहीं है मगर भटकाने में कारगर साबित हो रहे है। कहीं ऐसा ना हो कि अत्यधिक चकाचौंध में हम किट पतंग बन कर रह जाए और हमारे सोचने समझने व एहसास करने की क्षमता खत्म हो जाए। मानव के आचरण में कुछ विचित्र से परिवर्तन आ गए है।
विद्यार्थी किताब से दूर हो रहे है, शिक्षक छड़ी से दूर हो गए। पैरेंट्स जिम्मेवारी से दूर हो गए। लाईब्रेरी किताब से दूर हो रही है। हाथो से कागज कलम दूर हो रहे है। पाठक किताबो से दूर हो रहे है। ऑफिसेज फाईलो से दूर हो रही है। डा0 परम्परागत प्रैक्टिस से दूर हो रहे है। खेतो में किसान, मेहनत से मजदूर दूर हो रहे है। बच्चे बचपने से दूर हो रहे है। दिमाग इल्म से दूर हो रहा। सच जेहन से दूर हो रहा। सत्य तो यह है कि इंसान इंसानियत से ही दूर हो रहा है। बस एक तरह से नेट मानव को बेमुखिकरण का शिकार बना दिया है और आर्टिफिशल इन्टेलिजेन्सी मानव के दिमाग में भर चुका है। जहाँ बच्चे प्रौढो जैसे व्यवहार करने लगे है। चारो तरफ छिछलापन का आलम है, और बेचैनी, क्रूरता ही दिखाई दे रहा है ठोसता लगभग खत्म सी हो गई। व दिमाग दिवालियापन के कगार पर खड़ा हो अनर्गल अट्टहास कर रहा है।

*”बहव: नेटम् शरणं कदापि भला: न: करोति स्म:”*

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