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शिवानंद की कलम से : आर्थिक गैरबराबरी अंबानी की फिजूलखर्ची और गांधी जी।

RKTV NEWS/पटना (बिहार) शिवानंद तिवारी 18 जून।अपने देश में चिंता जनक गैरबराबरी है. आर्थिक मामलों के जानकार बताते हैं कि अंग्रेज़ों के राज में भी ऐसी गैरबराबरी नहीं थी. लेकिन इस गैरबराबरी पर बहुतों का ध्यान नहीं जाता है. अमीरी दिखाई देती है. लेकिन ग़रीबी दिखाई नहीं देती. या हम ग़रीबी देखना नहीं चाहते हैं.
अभी अमीरी का विभत्स रूप हमलोग देख रहे हैं. मुकेश अंबानी अपने बेटे की शादी कर रहे हैं.! शादी जुलाई में होने वाली है. लेकिन अभी शादी के पहले उत्सव मनाया जा रहा है. सामान्य तौर हम शादी को ही एक उत्सव मानते हैं. हमारे तरफ या देश भर में बेचिरागी शादियाँ भी होती हैं. ऐसी शादियों में धूमधाम नहीं होता है.लड़के वाले एक पेट्रोमैक्स लेकर बेटे की शादी करने आते हैं और दुल्हन लेकर चले जाते हैं. गाँव वालों को भी ऐसी शादियों की जानकारी नहीं मिल पाती है.
दुनिया भर में शादियाँ होती हैं. लेकिन धन का ऐसा प्रदर्शन कहीं और होता है इसकी जानकारी मुझे नहीं है.
अंबानी जी जिस बेटे की शादी कर रहे हैं उसकी विशेषता क्या है ! सिवाय इसके कि संयोग से वह नीता अंबानी के पेट से पैदा हुआ है. उस लड़के ने तय नहीं किया था कि हम नीता जी के पेट से ही पैदा होंगे. कौन कहाँ जन्म लेगा यह बच्चे तय नहीं करते हैं. यह महज़ एक संयोग है . अगर तय करके जन्म लेना होता तो कौन बच्चा ऐसे गरीब परिवार में जन्म लेना चाहेगा जिसे दो जून के भोजन पर संकट हो.
हमारे देश में कुछ करोड़ बच्चे ऐसे पैदा होते हैं जिनका जन्म के समय जितना वजन होना चाहिए नहीं होता है. ऐसा क्यों होता है ? ऐसा इसलिए कि गर्भावस्था में उनकी माँओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता . गर्भ में बच्चे को माँ से ही पोषण मिलता है. इसलिए ऐसे बच्चे जन्म से ही कमजोर होते हैं. उनका वजन या उनकी लंबाई उम्र के अनुसार नहीं होती है. उनकी बुद्धि का विकास नहीं होता है. इसलिए वे स्वस्थ नागरिक नहीं हो पाते हैं. मशहूर कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन जी इसको क्रूर क़िस्म की गैरबराबरी कहते थे.
आज़ादी के इतने दिनों बाद भी हम वह मुक़ाम हासिल नहीं कर पाए हैं जिससे देश भर में स्वस्थ बच्चे जन्म ले सकें.
इस पृष्ठभूमि में अंबानी जी अपने बेटे की शादी में जिस प्रकार धन लुटा रहे हैं वह बीभत्स लगता है. कुछ लोग यह कह सकते हैं कि धन उनका है. इस लिए वे जैसा चाहें उसका इस्तेमाल कर सकते हैं. जिस देश में करोड़ों बच्चे पोषण के अभाव में स्वस्थ नागरिक नहीं बन पाते हैं वहाँ इस प्रकार धन लुटाना अपराध जैसा लगता है.
गाँधी जी हमारे लिए मानक हैं. वे अंबानी या अदानी जैसे लोगों के धन को निजी नहीं मानते थे. बल्कि उनको उस धन का ट्रस्टी मानते थे. यानि उस धन का अपव्यय करने का उनको अधिकार नहीं है. आज अगर गाँधी जी होते और अंबानी को इस तरह धन लुटाते देखते तो उनका फ़ैसला होता कि सरकार उस संपत्ति को अपने हाथ में ले ले।

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