
आदमी कौन है????
यें आदमी है साहब!!!
विकास के दौड़ में कुछ इसी तरह टूट रहा।
किसीको को वक्त ने तोड़ा किसी को अपनो ने।
जख्म है कुछ दिख जाते है, कुछ दिखाई नहीं देते।
कुछ कोई देखना नहीं चहता।
आदमी है रंग अपने हिसाब से छोड़ता है।
गिरगिट तो यूँ ही बदनाम है साहब।
दुनिया है किसीको कोई रुलाना चाहती,
किसी को हँसना।
यही तो आदमी का अपना-अपना फ़ितरत है।
बस यें कुछ नफे नुकसान की बातें है साहब।
हर कोई वो माँ तो नहीं,कि प्रेम में वजह ना हो।
बस सब कुछ टिका है स्वार्थ की खोखले वुनियादो पर।
पता नहीं कब आँधी की झोके आए।
मिटा दे हर वो निशान को।
निःशब्द अंधेरी रात की कुछ सन्नाटो के तरह।
बस मतलब-मतलब की बातें है।
कौन किससे प्रेम करता है,पता नहीं।
समय ने कितने रौशन चराग को बुझते देखा है।
तो कहीं जूगनूओ की रौशनी,
गहन आमावस में भी राह दिखाती मिली।
बस कुछ विवेक कहूँ।
या मूर्खता की बातें,
आदमी बनाने की चाह में रोज टूटता गया।
बिखरता गया सौ-सौ टुकडो में।
बन नस्तर कोई टिस देता रहा।
ता-उम्र कुछ रेगनी की काँटो सा।
हाँ-हाँअंगिनत निशानियाँ जो दिखती है।
आदमी के बदन पर आदमी का दिया,
कुछ गहरे दाग धब्बों सा।
कोई संयोज कर रखता है कयामत तक,
कुछ भूल जाता यूँ दुरुह स्वप्न के तरह।
यें आदमी हैं साहब ना मालूम किरदार कितने है।
वक्त-वक्त पर बदलना,
आँखों में बिष रखना,
अंग-अंग में भुजंग,
जुबाँ पर दावानल,
पता नहीं कब कौन महाकाल बन जाए,
कब तारण हार बन जाए।
फिर घुमघुमा कर वही प्रश्न आता है साहब।
फिर आदमी कौन है? हाँ-हाँ आदमी कौन है????????


