ख़्वाब…!
एक रंगीन फ़िल्म है ।
कभी भी देखता हूं ।
पूर्वजों के पूर्वज ,
स्नेही मित्र गण ,
जैसे जिसके रिश्ते
वैसे अनुबंध रहे
ख्वाबों में उतर आते ।
मैं कौन हूं ?
कहां से आता हूं ?
क्या कर जाता हूं ?
यह हकीकत रहस्य है ।
ख़्वाब जब चले आते,
अजीब चक्र लगाते ।
वक्त ऐसे कटते ,
जाने अनजाने में ,
विस्मय में बने रहते ।
मेरी कुशाग्रबुद्धि ,
मंद मंद मुस्कराती ।
अपने पराये हो जाते ,
कभी पराये अपने हो जाते।
ख्वाब एक अंक बाद
दूसरा शुरू होता
नतीजन कोई अपना नहीं
पूरा होने वाला कोई ख़्वाब नहीं ।
उम्र की दहलीज पर खड़ा हूं ।
उतार चढ़ाव देखता हूं ।
सजाते हुए ,
ख्वाबों में सहेजता हूं ।
अंगड़ाई लेते ,
ख़्वाब प्यार से कहते ,
परिवर्तन में ,
खुशियाँ सदा समाई ।
तेरा मेरा मृत्यु लोक में,
बहुत पुराना रिश्ता है।
तुम्हें रंगते ,
मैं भी रंग जाता हूं।
सच ख्वाब एक फिल्म है।
जिसे कभी भी देखता हूं।
रचनाकार:अमिता मराठे(इंदौर मध्यप्रदेश)





ख़्वाब…!