
जैसी दिखी वैसी दुनिया…!
ना मैं इधर की कहूं,ना मैं उधर की कहूं।
मुझे जैसी दिखी वैसी,दुनियां की कहूं ।।
इंसान बदलते देखा,मर घट जलते देखा।
ऊंची ऊंची मीनारों को सिसकते देखा।।
रोशनी की अंधेरे में ,,,रौनकें बदल गई।
आनंदित संगीत की चौखटें बदल गई।।
नित होते जहां जलसे,जीवन रंग से रंगे।
वो रंग महल दिखे,मकड़ जालों से पगे।।
मूढ़ जब लौटता,अंतिम संस्कार करके।
भरीभरी आंखों को लौटता खाली करके।।
लगता ऐसा वह पूरा का पूरा बदल गया।
बनाया विराग का गीत,बन ग़ज़ल गया।।
कुछ नहीं सीखता प्रमिल यह पागल मन।
पिंजरे से उड़ जाएगा पंछी,मिटेगा ये तन।।
(साभार शब्दों की सरिता मंच)

