
चलन शवदाह वाहन का..!
विकासवादी युग के,
अजब-गजब अजूबे होंगे!
माँ-बाप नृह घोसले,
बच्चे सब परिंदे होगे!
रह जायेगे ठूंठ दरख्त,
हरियाली ना मंजर होगा!
हरा भरा चमन भी,
शायद अब बंजर होगा!
तर्क होंगे बेशुमार,
यें छ्द्मवादी युग का।
कलयुग के हमाम में,
नंगा-नंगा सारा मंजर होगा।
होगी गति तेज हर कदमों में,
पर सूनी आँखों के,
बिखरते सारे सपने होंगे।
ठहर जायेंगी गति,
या फिर धड़कन कह लो।
मुर्दों को नसीब शायद,
ना अपनो के कंधे होंगे।
आया कैसा यह जमाना,
कैसा यह चक्रवात है।
कि अर्थ के दावानल में,
जलता सारा मंजर होगा।
यें शवदाह वाहन ही नहीं,
बानगी है सभ्य समाज का।
यह देखना कि,
आने वाला कैसा और मंजर होगा।
जिस कदर अकेला,
परिवार यें समाज होने लगा!
कि आने वाले वक्त में,
नसीब कफन ना चार कंधे होंगे!
बस जीवन व श्मशानो के दरमयाँ,
राब्ता-ए-दौलत होंगी।
कि हिस्से के लिए जानीब,
लड़ता-मरता सारा अपना होगा।
लड़ता मरता—————।


