
मैं ढूंढ ही रही थी किसी हमख़याल को।
फ़ैलाया फ़िर से उसने मुहब्बत के जाल को।
समझी नही थी पहले मैं उसकी चाल को।
अच्छा हुआ सफ़र में मुझे तुम जो मिल गए।
कोई हमसफ़र नही था मेरी देखभाल को।।
मिलता नही किसी से मेरा ख़याल यूँ।
मैं ढूंढ ही रही थी किसी हमख़याल को।।
उम्मीद का है आया फ़िर साल ये नया।
काटा है किस तरह से मैंने गुज़रे साल को।।
दे पाउँ ना मैं शायद इसका कोई जवाब।
रखना न मेरे आगे फ़िर इस सवाल को।।
मैं सोचती हूँ अक्सर सोचेगा वो मुझे।
पूछेगा जब वो आकर कभी मेरे हाल को।।
अश्क़ों से भीगता है ढलता है आँख से।
वो चूमकर गया था मधु मेरे गाल को।।



