
सावधान पग पग पर रहना..!
सर्प बिषैले थहाँ घूमते,
रिश्ते में रख गिरगिट के गुन।
मोहक बातें मकड़-जाल सी,
किसको छोड़े किसको ले चुन?
मन के भेद कभी ना कहना।
सावधान पग-पग पर रहना।।
सद-इच्छा यदि मन में जागे,
मदद करी यदि बढ़ कर आगे।
लंपट घूर्त नहीं पहचाना,
बदलें रूप रोज जो नाना।
ठग जाओ तो फिर मत कहना।
सावधान पग-पग पर रहना।।
अपनापन ज्यादा दिखलाते,
वक्त पड़े पर काम न आते।
सदा घात में जो ठगने की,
सूची ध्यान रखो अपनों की।
कभी नहीं होगें यह गहना।
सावधान पग-पग पर रहना।।
कोमल मन के भाव आपके,
धूर्तों के है मंत्र जाप के।
सगे नहीं है सगे बाप के,
दुर्गुण इनमें भरे नाप के।
इनकी दुनिया का क्या कहना।
सावधान पग-पग पर रहना।।
मैं औ मेरा ध्येय रखें हे,
अनाचार से पेट भरे हैं।
नहीं मानते भाभी भैया,
इनका ईश्वर सदा रुपैया।
नहीं पास इनकी माँ बहना?
सावधान पग-पग पर रहना।।
रिश्ते-नाते, राजनीति में,
संबंधों के प्राण प्रीति में।
ये अपराधी देव-भाव के,
खर-दूषण से राम-काज के।
धर्म नहीं है इनको सहना।
सावधान पग-पग पर रहना।।
धर्म संस्कृति सबके है घातक,
मानव-मूल्यों के ये पातक।
सदा प्रदूषण मानवता के,
लक्षण एक नहीं सेवा के।
मुश्किल साथ संग में रहना।
सावधान पग-पग पर रहना।।
इनको जल्दी से षहचानों,
जीवन सफल तभी खुद मानो।
ये ही कीट फसल-जीवन के,
बहुरुपिये हैं अपनेपन के।
सदा फेंकते बिष का फैना।
सावधान पग-पग पर रहना।।


