RKTV NEWS/अनिल सिंह 30 जनवरी।जंग और इश्क में सब जायज है .. वाली कहावत काफी प्रचलित है अब इस कहावत के शब्दों का भी विस्तार करने की आवश्यकता है और तीसरे शब्द राजनीति को लगाना सटीक भी बैठता है। देश और राज्यों में आए दिन हो रहे राजनीतिक समीकरणों के लिए गठबंधन बनाना और तोड़ना हालांकि यह प्रचलन राजनीति में शुरू से रहा है लेकिन हाल के दिनो मे इसके बेतहसा बढ़ रहे प्रचलन से अब इसे कहावत के रूप में परिभाषित करने की जरूरत है अब इश्क ,जंग और राजनीति में सब जायज है ….! कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी और मन को तशल्ली भी मिलेगी की चलो ऐसा तो होता ही है।
बयानों पर कैसे करें ऐतबार..?
देश और राज्य स्तरों पर सत्ता की जोड़ तोड़ के लिए राजनीतिक पार्टियों द्वारा गठबंधन को तोड़ने और जोड़ने के बीच कई बयानबाजी सत्ताधारी और विपक्ष के नेताओं के द्वारा आम सभाओं ,राजनीतिक बयानबाजी के बीच आती रहती है जिसकी सत्ता है वो गैर सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ और जिसकी सत्ता जिस राज्य में नही है वो सत्ताधारी पार्टियों या गठबंधन की सरकार पर तीखी बयानबाजी करते हैं। यहां तक कि व्यक्तिगत रूप से भी उनके चरित्र और सिद्धांतों का भी काफी निचले स्तर तक बखान किया जाता है।जिसे मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर काफी तवज्जो से देखा भी जाता है।खैर यह तो राजनीति है….. करना ही पड़ता है।लेकिन जनता इनके द्वारा दिए गए बयानों के आधार पर अपनी एक राय बना लेती है वो चाहे किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के लिए हो या क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए और उसी आधार पर पार्टियों के सिद्धांत, दलों के मुखिया के नैतिक विचार पर अपना बहुमूल्य मत उन्हे देती भी है ताकि उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचारों और सिद्धांतों के आधार पर एक कुशल सरकार का गठन हो सके और उन्होंने जिस पार्टी के विचारों और सिद्धांतों के खिलाफ उन्हे मत दिया है वो सार्थक हो सकें।लेकिन सत्ता की लालसा में अपने बयानों और सिद्धांत से इतर जिस दल को चुनावों में जनता उनके द्वारा आश्वस्त कर दिए गए बयानों और विचारों से प्रभावित होकर अपना अपना मत देती है। वो आए दिन राजनीतिक दलों के टूटते और जुटते गठबंधनों से अपने आप को ठगा महसूस करते है और यह सोचने पर भी विवस हो जाते है की दलों द्वारा सत्ता के लिए किए जा रहे बयान फिर सत्ता के लिए उसी बयान से पलट राजनीतिक गठबंधन कर सरकार बनाते हैं ऐसे में जनता के बीच इनके द्वारा किए गए सिद्धांत और विकास के लिए बयानों और वादों पर कैसे ऐतबार करे?
उतरी नही पगड़ी टूट गई कसम….
नीतीश कुमार के भाजपा गठबंधन से नाता तोड महा गठबंधन के साथ सरकार बनाने के बाद से भाजपा द्वारा कई तरह की बयान बाजिया राजनीति में आम होने लगी थी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के पद पर रहते हुए सम्राट चौधरी ने अपने सर पर नित्य बंधी पगड़ी तक पर दांव लगा राजनीतिक आवेश में कई सभाओं में ये कहा की नीतीश कुमार को सत्ता से बेदखल करने के बाद ही वो पगड़ी खोलेंगे।लेकिन इसके इतर नीतीश कुमार को सत्ता से दूर करने की बजाए उनके नेतृत्व के साझीदारी बन बैठे और उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए।अब यक्ष प्रश्न यह उठता है की सम्राट चौधरी आखिर अब कब ?अपनी पगड़ी खोलेंगे या उसे खोलने के लिए वो अब कौन सी नई प्रतिज्ञा जनता के सामने लाएंगे?वही दूसरी ओर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महा गठबंधन की सरकार में मुख्यमंत्री रहते हुए भाजपा में दुबारा नही जाने के लिए कसम खाते हुए मर जायेंगे लेकिन भाजपा में नही जायेंगे…के भी अपनी कसम का मान नही रखा।
गठबंधन “शुद्धिकरण” की पाठशाला
जिस कदर से गैर सत्ताधारी दलों द्वारा विभिन्न राज्यों में सत्ता में काबिज होने की होड़ मची है और तरह तरह की बयानबाजियां एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए की जा रही है यह सर्व विदित है कोई सरकार की नाकामयाबी की दास्तां बयां कर रहा है तो कोई नेताओं की व्यक्तिगत मानसिकता को दर्शा रहा है। वैसे तो कई उदाहरण है सत्ताधारी दल के नेताओं द्वारा गैर सत्ता धारी शासित प्रदेश के दलों और मुख्यमंत्रियों पर तीखी बयानबाजी का जिसका हालिया उदाहरण महा गठबंधन की सरकार में मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण को ले शिक्षा के कारण प्रजन्न को लेकर महिलाओं की जागरूकता पर उनके द्वारा अपने शब्दों में दिए गए बयान पर जिसको लेकर भाजपा के वरीय नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं द्वारा भी नीतीश कुमार के उक्त बयान को अमर्यादित भाषा का प्रयोग और महिलाओं की स्मिता पर चोट की संज्ञा दे काफी टिप्पणियां की गई थी जो कई दिनों तक अखबार की सुर्खियों और सोशल मीडिया पर छाई रही यहां तक की उक्त बयां को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महिलाओं के प्रति नकरात्मक चारित्रिक चित्रण तक कर दिया गया। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हो या केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी सभी ने इसकी निंदा की।केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी खुले मंच से नीतीश कुमार के लिए भाजपा के दरवाजे को हमेशा के लिए बंद होने की बात कही थी। महागठबंधन में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री के कार्यशैली पर कई सवालों को उठाया गया जंगल राज सरकार की वापसी की भी संज्ञा दी गई।लेकिन यह कहने में कोई परहेज नहीं की गठबंधन एक ऐसी पाठशाला बन गई है जहां सम्मिलित होने के बाद सारी कमियां अपने आप धूल जाती है वो गठबंधन चाहे भाजपा की सरकार की हो या महागठबंधन की।
एक बात तो यह तय है की आजकल गठबंधन के टूटते जुड़ते गांठों के बीच जनता के मतों का दुरुपयोग या यूं कहे की उनके मतों का हनन किया जा रहा है जिन्होंने लोकतंत्र में मिले मताधिकार के तहत अपने अपने मतों को अपने अपने दलों के विचारों और सिद्धांतो को दिए लेकिन अपने मतों का गठबंधन के रूप में हो रहें इस प्रयोग के माध्यम से सत्ता पर काबिज होने पर चिंता जाहिर कर रही है।

