
जाड़े की रात
घना कोहरा, सुनसान सड़क
सड़क पर आवारा कुत्तों का झुण्ड
ठंड से बचने के लिए
आशियाना तलाश रहा है।
वहीं फुटपाथ के किनारे वैसे लोग, जिन्हें
आशियाना मयस्सर नहीं है,
वे अलाव जलाकर
उसके इर्द-गिर्द बैठे हुए हैं और
बीच- बीच में पुलिस हड़का जाती हैं ।
ये परिस्थितियाँ एक सभ्य समाज और
सुशासन रूपी सरकार के मुँह पर तमाचा मारने जैसा है,जो दिन-रात विज्ञापन के द्वारा बेघरों और बेसहारा लोगों को घर देने का प्रचार करती रहती है।
जाड़े की रात
गरीबों के लिए कष्ट लेकर आती है।
इस देश और समाज में दो तरह के लोग रहते हैं, एक जो बंद कमरे में विलासितापूर्ण जीवन जीते हैं और जो गरीबों के लिए गरीबी से जुड़ी नीतियों को बनाते हैं औऱ
दूसरी तरफ वे लोग जो सरकार की उपेक्षा के शिकार हैं और कष्टमय जीवन जीने को मजबूर हैं।
जाड़े की रात
एनजीओ और समाजसेवी संस्थानों के लिए
फंड का जुगाड़ कराती है,
फंड का कुछ हिस्सा गरीबों के हिस्से आता है और ज्यादातर हिस्सा नेताओं और नौकरशाहों की जेबगर्म करने में चला जाता है।
जाड़े की रात
कुछ लोगों के लिए अवसर बन कर आती है औऱ कुछ लोगों के लिए त्रासदी बनकर।

