
रिश्तों के बाजार…!
रिश्तों के बाजार में,आती है नित खोट।
चुनाव के संग्राम में, मांग रहे हैं वोट।।
जगह-जगह धोखाधड़ी,किसको माने मीत।
कोई भी दिखता नहीं,जिससे कर लें प्रीत।।
महिला पर भी देखते,अज़ब नशा है यार।
बच्चे छोड़े भागती, भौतिक सुख से प्यार।।
पुरखा घर में सड़ रहे,खाने को मोहताज।
बीवी सिक्का चल रहा, बूढ़े लगते खाज।।
पेपर, चैनल से हुई, विज्ञापन भरमार।
झूठ-मूठ का खेल है,ठगती जनता सार।।
साॅंच कहें वो चुप हुए, झूठों का बाजार।
शर्मशार इंसानियत, कलयुग का आधार।।
जो कुछ घटता सामने, कहते नहिं हैं लोग।
दुनियाॅं कहते हैं बुरी ,कैसा ये संयोग।।
चाचा ताऊ हैं बुरे, नफ़रत और तकरार।
साॅस-ससुर की मौज है, बढ़ता है व्यापार।।
रिश्तों के घर काॅंच के,चटकन का डर बोज।
स्थाई कैसे ये बनें, इसकी करना खोज।।
यों ही रिश्ते टूटते, समझो सुख को दूर।
क्रांति एक दिन आयेगी, होंगे ना भरपूर।।
साभार “शब्दों की सरिता” मंच

