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योग स्वास्थ्य शिविर में कफ एवं वात के रोग, प्रतिश्याय, गले के विकार और उदर के कृमि दूर करने का अभ्यास।

आरा/भोजपुर 08 दिसंबर।राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा संचालित व बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति के नेतृत्त्व मे जिला स्वास्थ्य समिति भोजपुर के तत्वावधान में योग प्रशिक्षक विक्रमादित्य ने बड़हरा स्वास्थ्य केन्द्र के उप स्वास्थ्य केन्द्र सह हेल्थ एण्ड वेलनेस सेन्टर करजा के संचालिका सुनिता सैनी,बखोरापुर के संचालक सत्यरंजन कुमार सिंह व सरैया के संचालीका प्रियंका कुमारी के सहयोग से शरद ऋतुकाल के कारण गले के विकार जैसे सर्दी-जुकाम और उदर से संबंधित समस्याओ के समाधान के लिए योगाभ्यास क्रियाओ का आयोजन हुआ। योग स्वास्थ्य शिविर योग प्रशिक्षक विक्रमादित्य ने बताते कहा कि नाड़ीशुद्धि का प्रथम विधि दाहिने हाथ की तर्जनी और मध्यमा अंगुलियों को मोड़कर अंगूठे के मूल में लगाइए।शेष दोनों अंगुलियाँ और अंगूठा सीधे रहेंगे।इसे ज्ञानमुद्रा कहते हैं।
अंगूठे से दाहिने नासिका छिद्र सूर्यस्वर को बन्द करके बाएँ नासिका छिद्र चन्द्रस्वर से आठ(8)गिनते हुए श्वास लीजिए।
उसी स्वर से सोलह(16)गिनते हुए छोड़िए।ऐसे तीन चक्र पूरे कीजिए।
इसी प्रकार दाहिने स्वर से पूरक(श्वास भरना)और रेचक (श्वास छोड़ना)8-16गिनते हुए तीन चक्र कीजिए।ये सभी क्रियाएँ शान्त, एकरस और आँखों को बन्द करके करनी उचित है।
दूसरी विधि-बाएँ स्वर से पूरक और दाहिने स्वर से रेचक कीजिए। ऐसे तीन चक्र इसी प्रकार करें।अब दाहिने से पूरक और बाएँ से रचक करके तीन चक्र पूरे कीजिए।
तृतीय विधि-चन्द्रस्वर से 8गिनते हुए पूरक करके सूर्यस्वर से 16 गिनते हुए रेचक करें।
सूर्यस्वर से इसी प्रकार संख्या गिनते हुए पूरक और चन्द्रस्वर से रेचक कीजिए। यह एक चक्र पूरा हुआ। ऐसे 3-21चक्र पूरे कीजिए।
चतुर्थ विधि(अनुलोम-विलोम प्राणायाम)-चन्द्रस्वर से पूरक 8गिनते हुए कीजिए।
पूरक के पश्चात जालंधरबन्ध लगाइए।दोनो स्वरों को अंगूठे और कनिष्ठा तथा अनामिका से बन्द कर लीजिए। नासिका द्वारों को प्रारंभ में ही बन्द करना चाहिए। पश्चात इसकी विशेष आवश्यकता भी नहीं है।32संख्या गिनने तक कुम्भक(श्वास को भीतर रोकना)कीजिए।
सूर्यस्वर से 16 गिनते हुए श्वास छोड़िए। यहाँ आधा चक्र पूरा हुआ।
इसी प्रकार सूर्यस्वर से श्वास भरकर उसे रोकें और बायें से बाहर निकाल दें।यह एक चक्र पूरा हुआ। ऐसे 21चक्र प्रतिदिन किये जा सकते हैं।
इस प्राणायाम से 72000 नाड़ियों की शुद्धि होती है।तीन मास तक प्रातः,दोपहर,सायं और अर्धरात्रि में अभ्यास करने से शरीर में लघुता जठराग्नि-प्रदीप्ति,मुख पर क्रान्ति और दिव्यनाद श्रवण इत्यादि लक्षण पकट होते हैं।
सूर्यभेदन विधि-दाहिने स्वर से 8 गिनते हुए श्वास को भीतर लीजिए।
जालंधरबन्ध लगाकर 32तक कुम्भक कीजिए।
बाएँ स्वर से 16 गिनते हुए रेचक कीजिए। यह एक चक्र पूरा हुआ। ऐसे 3चक्र पूरे कीजिए।
इस प्राणायाम से जठराग्नि की वृद्धि होती है।कफ एवं वात के रोग, प्रतिश्याय, गले के विकार और उदर के कृमि दूर होते है
यह प्राणायाम उष्णता बढ़ानेवाला है,अतःपित्तप्रकृत्तिवालों को और दूसरों को भी ग्रीष्मऋतु में इसका 3चक्र से अधिक अभ्यास नहीं करना चाहिए।
उज्जायी विधि-कण्ठ का आंशिकरूक से आकुंचन करके श्वास को भीतर लीजिए। श्वास ह्रदय तक जाता अनुभव होवे।कण्ठ के संकोच से श्वास लेने पर सिसकने, हलके खराटे या सूँ सूँ जैसी ध्वनि निकलेगी।वक्षस्थल को फुलाना और उदर को संकुचित करना चाहिए।
पूरा श्वास इस विधि से भरने के पश्चात जालंधरबन्ध लगाकर श्वास को भीतर रोकिए।
बाएँ स्वर से उसी प्रकार संकुचित कण्ठ से श्वास को बाहर निकालिए।
पूरक, कुम्भक, रेचक में1:4:2का अनुपात रहना चाहिए। प्रारंभ में बिना कुम्भक के दोनों नासिका द्वारों से स्वरसहित पूरक और उससे दोगुने समय में रेचक करना ही पर्याप्त है।
नाक,मुख को सिकोड़ना या मुख की बुरी आकृति बनाकर प्राणायाम करना अनुचित है।
सभी नाड़ियों एवं धातुओं का शुद्धिकारक है।स्वर,कफ,गले के विकार इससे दूर होते हैं।दमा के लिए बहुत लाभकारी है। इसके अभ्यास से थायरॉइड ग्रन्थि का असन्तुलन,टॉन्सिल की सूजन तथा श्वसन नली में आया अवरोध दूर होता है।ह्रदय रोगों में उपयोगी है।

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