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पटना:लौह पुरुष भारत रत्न सरदार वल्लभ भाई पटेल की 148वीं जयंती एवम सम्मान समारोह अयोजित।

पटना/बिहार 31 अक्टूबर।अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ के राष्ट्रीय महासचिव डा. एल.बी.सिंह के तत्वाधान में लौह पुरुष भारत रत्न सरदार वल्लभ भाई पटेल की 148वीं जयंती एवम सम्मान समारोह अयोजित की गई। जिसकी अध्यक्षता डा.एल.बी.सिंह ने की जिसमें उद्घाटनकर्ता पद्मश्री सुधा वर्गीज जी थीं और मंच संचालन ऑल इंडिया अभिभावक संघ अध्यक्ष राकेश रॉय पटेल ने की। वहीं अतिथियों का स्वागत बिजेंदर तिवारी जी ने किया। दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया जिसमें सर्वप्रथम सामाजिक क्षेत्र में किया गया अहम योगदान के लिए कई अहम लोगों को शाल , मेमोंटो और सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया गया। डा.बी एल सिंह ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रणी नेता और स्वतंत्र भारत के महान दूरदर्शी राजनेता एवं प्रशासक थे ।भारत का संविधान बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1918 में खेड़ा संघर्ष से राजनीति में उनका प्रवेश हुआ था। 1928 में बारडोली सत्याग्रह की सफलता के साथ राष्ट्रीय राजनीतिक में उनका महत्वपूर्ण स्थान हो गया। बारडोली सत्याग्रह की सफलता पर वहां की महिलाओं ने उन्हें *सरदार* की उपाधि दी थी। तब से उन्हें सरदार पटेल के नाम से जाना जाने लगा ।
अंग्रेज सरकार द्वारा भारत की स्वतंत्रता के साथ-साथ 565 रजवाड़ों को भी स्वतंत्र कर दिया गया था। सरदार पटेल की सूझबूझ और दूरदर्शिता के कारण 562 रजवाड़ों को 15 अगस्त 1947 तक भारत में विलय कर लिया गया था । उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति एवं प्रशासनिक सुझबुझ से जूनागढ़ और हैदराबाद रियासत को आजादी के बाद भारत में विलय करा लिया गया। जम्मू कश्मीर रियासत को भारत के साथ मिलाने और बचाए रखने का श्रेय सरदार पटेल को ही जाता है।
सरदार पटेल लंदन में वैरिस्टरी की पढ़ाई में अपने बैच के टॉपर थे। एक बार वल्लभभाई कोर्ट में बहस कर रहे थे। तभी किसी व्यक्ति ने उनको एक चिट पकड़ा दिया । उन्होंने देखा और फिर मोड़कर अपने पॉकेट में रख लिया। बहस समाप्त होने के बाद वह बहुत मायूस हो गए । पता चला कि उनकी पत्नी का देहावसान हो चुका है। यह जानकर भी वह बहस करते रहे।सरदार की इस कर्तव्य निष्ठा पर सभी अवाक थे ‌। सरदार पटेल अपने कर्तव्य पर भावना को कभी आरूढ़ नहीं होने दिया । जीवन पर्यंत अपने कर्तव्य पथ पर चलते रहे। ना धन की परवाह थी और ना ही शरीर की। आज भारत का जो नक्शा हम देख रहे हैं, वह सरदार पटेल की देन है। बीमारी की हालत में भी अपने कार्य करते रहने का उनका अपना अंदाज था। देश के प्रति उनकी कर्तव्य निष्ठा थी। उन्हें देश और देश के लोगों की चिंता थी। वह हमारे खुशहाल जीवन के लिए स्वयं की आहुति दे दी । बीमारी की अवस्था में 12 दिसंबर 1950 को उन्हें दिल्ली से मुंबई ले जाया गया। वहां दिल का दौरा पड़ने पर 15 दिसंबर 1950 को मुंबई के बिरला हाउस में उनकी मृत्यु हो गई। भारत ने अपने एक महान सपूत को खो दिया । उनके मृत्यु पर हजारों वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी उनके निवास स्थान पर पहुंच कर देश के लिए पूर्ण निष्ठा के साथ कार्य करने का शपथ लिया था । राजनीति का अर्थ सरदार पटेल के जीवन से सिखा जा‌ सकता है। देश के लिए और देश की जनता के लिए जीवन आहूत करने की प्रेरणा हमें सरदार पटेल से मिलती है।
कार्यक्रम में शामिल अन्य लोग में पूर्व विधायक राजकिशोर सिंह, संजू कुमारी पटेल, डा.पप्पू कुमार सिंह, मनीष कुमार खरगा, जे पी सेनानी ब्रह्मदेव पटेल, डा.कुमारी सिम्पी रानी,अभिमन्यु कुमार आदि।

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